पूरब-पश्चिम
पिछले दिनों सामूहिक भोज में चर्चा का विषय था, विश्व की दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा कौन सी है. पास बैठे हुए विद्वान अमेरिकी मित्र फ़रमा रहे थे कि ये फ्रांसीसी भाषा ही होगी. मैंने अपनी आदत के अनुसार रंग में भंग डाला और पूछा, भैया पहले सबसे लोकप्रिय भाषा का नाम तो बताओ. उन अमेरिकी मित्र के इर्द-गिर्द मौजूद अंग्रेज़ी प्रेमी गुर्रा के बोले, ये भी नहीं जानता! मैं घबराया, और बची-खुची हिम्मत जुटा के बोला नहीं मैं ये नहीं जानता, क्योंकि आप जो कहना चाहते हैं वह सही नहीं है. एक अंग्रेज़ी प्रेमी की टेढ़ी निगाहें बोलीं, तू कौन होता है इस अटल सत्य को स्वीकार ना करने वाला?
पूरी चर्चा में चीनी (मंदारिन) और हिन्दी का कोई नामोनिशान नहीं था, और इस मुद्दे पर मुझको सबके साथ "पंगा" लेना पड़ा. अगर आप मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या की दृष्टि से देखें, तो चीनी के बाद हिन्दी का स्थान आता है. और अगर समझने वालों की संख्या की दृष्टि से देखा जाय तो भी अंग्रेजी प्रथम नहीं है, और फ्रांसीसी का तो नाम दूर दूर तक नहीं दिखता. मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह की सूचियों में उच्च स्थान पर आना विशेष गर्व का विषय है, बल्कि इंगित मात्र करना चाहता हूं कि पूर्व के बारे में पश्चिम के लोग कितने अनभिज्ञ और उदासीन हैं. उनके अनुसार भारत की हर गली में दो-चार घर सपेरों के होते हैं, बुजुर्ग लोग बडी़ सी दाढी़ और जटा रखते हैं, इत्यादि.
खैर हमको क्या मतलब अगर कोई हमारे बारे में अनभिज्ञ रहे, लेकिन हम स्वयं को ठीक से जानें यही पर्याप्त है. हिन्दी के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में बच्चों वाले पृष्ठ पर इंटरनेट सुरक्षा के संबंध में मुझे मिला यह वाक्य: "नेट यूज़ करते समय अपने पेरेन्ट्स और टीचर्स की हेल्प लें". अगर अगली पीढ़ी कहेगी कि "प्रयोग, माता-पिता, गुरुजन, सहायता, ये सारे वर्ड्स आउटडेटेड हैं", तो जिम्मेदार आखिर कौन होगा?



