रो मत बेटा
मैंने सुना है कि रामगढ़ में जब भी कोई बच्चा रोता है तब मां कहती है, "रो मत बेटा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जायगा". बहुत ही नायाब तरीका है यह बच्चे चुप करवाने का. लेकिन यहां यूरोप में रामगढ़ तो कहीं है नहीं, तो जब भी बच्चा रोता है तो माता-पिता बच्चे के मुंह में रबर की चुसनी ठूंस देते हैं. अगर बच्चा सार्वजनिक जगह पर रोये तो लोग माता-पिता और बच्चे को टेढ़ी नज़र से देखते हैं. अब भैया, बच्चों का रोना तो स्वाभाविक क्रिया है, काहे उसे रोकना. जब तक बच्चे अस्वाभाभिक रूप से अधिक न रोयें तब तक ठीक ही है. बच्चे चुप कराना भी कला है, जिसमें माहिर होने के लिये आपको बच्चे पर अधिक ध्यान और समय देना होता है. समय तो तब मिले ना जब बाकी कामों से फ़ुर्सत मिले.
आज ट्रेन में ऐसी ही एक दुर्घटना घट गयी. एक बच्चा रोने लगा, मां ने चुसनी ठुंसाये बिना बच्चे को प्यार से चुप करवाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चा माना नहीं. पास बैठे एक सज्जन से बच्चे का दर्द देखा नहीं गया और उन्होंने अपने श्रीमुख से भले-बुरे शब्द निकाल दिये. भले शब्द थे कि बच्चे चुप करना तो बहुत आसान काम है, ये भी नहीं कर सकतीं, और भैया, बुरे शब्दों का भावार्थ न ही करूं तो अच्छा है.
मेरे विचार से चुसनी ठूंस देना भी हिंसा का ही एक रूप है, और छोटे बच्चे को स्वयं को व्यक्त करने के लिये रोने का सहारा न लें तो और करें भी क्या? बच्चे रोकर क्या कहना चाहते हैं, इसको नज़र-अंदाज़ कर देना माता-पिता की लापरवाही है.




सही विवरण लिखे हैं।
Comment by समीर लाल — May 8, 2006 @ 4:28 pm
बहुत ही सही बात कही है आपने…
सच्ची अोर कडवी
Comment by vish — May 8, 2006 @ 7:34 pm
बहुत सही और अच्छी बात लिखी है। लेकिन फिर भी कई बार चूसनी देकर ही पीछा छुड़ाना पड़ता है (था)
Comment by रजनीश मंगला — May 12, 2006 @ 3:00 am