डाक्टर बुधीराम
बुधिया तो दौड़ गया ६५ किलोमीटर, आम जनता ने तालियां पीट दीं और खास जनता ने दौड़ा दिया दिमाग़. बोल रहे थे, बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, उसकी जान को खतरा है! नेताजी को समझ आया और सरकार ने बुधिया के गुरूजी को मुर्गा बना दिया.
हमारे गांव में भी बहुत सारे बुधिया थे. उनमें से एक के बारहवीं क्लास में पूरे ४९.५ परसैन्ट नंबर आये. ईक्वल अपरचूनिटी के नाते बुधिया गया डाक्टरी पढ़ने. हम बोले कि बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, सबकी जान को खतरा है! नेताजी को इस बार कुछ समझ नहीं आया!




भाई वाह बन्धु…… इसे कहते हैं…कटाक्ष…बहुत बढ़िया….
साधुवाद !
Comment by Nidhi — May 22, 2006 @ 8:35 pm
बहुत जबरदरस्त, भई, गजब चोट की है.बधाई.
Comment by समीर लाल — May 23, 2006 @ 12:40 am
नेता जी की समझ……
Comment by राम चन्द्र मिश्र — May 23, 2006 @ 2:30 am
ये बुधिया मेरी कक्षा मे था !
Comment by आशीष — May 23, 2006 @ 5:28 am
मैं आरक्षण के पक्ष में नहीं हुं, पर यह बताईये क्या डॉक्टरी पास भी आरक्षण के बल पर हो सकती हैं? डॉ. तो तब बनेगा न कब पास होगा. हाँ सिटे जरूर खराब होगी.
Comment by संजय बेंगाणी — May 23, 2006 @ 11:22 am
सभी की टिप्पणियों का स्वागत है, आप सब को धन्यवाद.
संजय जी, सवाल अच्छा है. इस बारे में परसों बी.बी.सी. के एक कार्यक्रम में चर्चा हो रही थी, डा. के.के. अग्रवाल और प्रो. योगेन्द्र यादब मुख्य प्रतिभागी थे. डा. अग्रवाल ने एक व्यवहारिक बात कही. जब किसी का दाखिला बिना उचित योग्यता के हो जाता है तो उसको पढ़ाना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. ऐसे छात्रों के पास विषय समझने के लिये न्यूनतम ज्ञान भी नहीं होता. कई बार ये छात्र संस्थान ले लिये सिरदर्द बन जाते हैं, एक ही कक्षा में साल-साल पडे़ रहते हैं, और बहुत से सहानुभूति के आधार पर परीक्षा पास करते हैं. अब डिगरी पर यह भी नहीं लिखा होता कि कितने साल में अंतिम परीक्षा पास की गयी है. तो इस हिसाब से एक बार दाखिला पा लेने के बाद ५०% अंकों के साथ कई साल लगाकर परीक्षा पास करना और डाक्टर बन जाना उतना कठिन भी नहीं.
Comment by khulepanne — May 24, 2006 @ 12:00 am
bahut likhe jaa rahe ho…kiske liye
Comment by aditya — May 25, 2006 @ 10:50 am