पिटारा भानुमती का

July 23, 2006

बाबा काज़मी की एक रचना

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:26 pm

पिछ्ले दिनों पाकिस्तान के मशहूर शायर बाबा अहमद नदीम काज़मी का स्वर्गवास हो गया. बाबा काज़मी को गुलज़ार साहब जैसे महारथी अपना गुरु मानते थे. तो प्रस्तुत है बाबा काज़मी की एक रचना, भावों की गहरायी देखिये:

कौन कहता है

कौन कहता है कि मौत आयी तो मर जाऊंगा
मैं तो दरिया हूं, समन्दर में उतर जाऊंगा

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊंगा
घर में घिर जाऊंगा, सहरा में बिखर जाऊंगा

तेरे पहलू से जो उठूंगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख्स को पाऊंगा, जिधर जाऊंगा

अब तेरे शहर में आऊंगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊंगा

तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वरना सोचा था कि जब चाहूंगा, मर जाऊंगा

चारासाज़ों से अलग है मेरा मेयार कि मैं
ज़ख्म खाऊंगा तो कुछ और संवर जाऊंगा

अब तो खुर्शीद को डूबे हुए सदियां गुज़रीं
अब उसे ढ़ूढने मैं ता-बा-सहर जाऊंगा

ज़िन्दगी शमा की मानिंद जलाता हूं ‘नदीम’
बुझ तो जाऊंगा मगर, सुबह तो कर जाऊंगा

– बाबा अहमद नदीम क़ाज़मी

इस रचना के कुछ अंशों को स्वयं बाबा काज़मी की आवाज़ में यहां सुनिये.

[आसानी के लिये कुछ शब्दार्थ:

दरिया = जलस्रोत; सहरा = रेगिस्तान; अब्र = बादल; मानिंद = के जैसे, की तरह; पैमान = वादा;
चारासाज़ = चिकित्सक, सहानुभूति रखने वाला; मेयार = स्तर, गुणवत्ता; खुर्शीद = सूर्य; सहर = सुबह;
ता-बा-सहर = सुबह तक]

ईश्वर बाबा काज़मी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे.

1 Comment »

  1. अमित जी,

    बहुत बहुत शुक्रिया ऐसी उम्दा रचना उपलब्ध कराने के लिये

    आशीष

    Comment by आशीष — July 23, 2006 @ 6:50 pm

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