जनतंत्र के हित में
समाचारों का भी फ़ैशन होता है. अभी जो फ़ैशन में नहीं है, वह आउटडेटेड है. और भैया आउटडेटेड समाचारों को मीडिया वाले क्यों छापें? आरक्षण का मुद्दा ठण्डे बस्ते में चला गया और किसी को याद ही नहीं कि दो महीने पहले दिल्ली के मेडिकल छात्रों का विशाल जत्था, सिर्फ़ इसलिये कि हमारे नीति-निर्धारकों के कान पर कहीं तो जूं रेंगे, भूख हड़ताल पर था. पर रात गई, सो बात गई.
अभी शनिवार की ही बात है, आई.आई.टी. कानपुर के छात्रों ने सोचा कि कुछ और नहीं तो सोनिया गांधी के सामने ही गुहार लगायी जाय. वैसे भी सोनिया जी ८ अगस्त को आ ही रहीं हैं कानपुर में एक रैली के लिये. तो योजना बनी कि उनकी रैली के समय शान्तिपूर्ण तरीके से आरक्षण के विरोध में मानव श्रृंखला बनायी जाय. खबर कांग्रेस वालों तक पहुंची तो उन्होंने फ़ील्डिंग लगायी. नतीजा हुआ कि १५ छात्र आई.आई.टी. गेट पर गिरफ़्तार कर लिये गये. क्या हमारे सशक्त लोकतंत्र को इन निहत्थे छात्रों से इतना खतरा है कि उनको हथकड़ियां पहनायी जायें?
फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की एक नज़्म की ये पंक्तियां याद आती हैं, जो उन्होंने लिखीं तो पाकिस्तान के लिये थीं, पर हमारे ऊपर भी लागू होती हैं:
निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन, कि जहां
चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्मो-जां बचा के चले
सोनिया जी, सुन रहीं हैं क्या?



