पिटारा भानुमती का

January 21, 2007

कब सुधरेंगे हम?

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:35 am

मेरे पड़ोसी रामलाल की भैंस चोरी हो गयी है. मुझे पक्का पता है कि पास के गाँव रईसपुर के पूर्व प्रधान झाड़ सिंह के बेटे झाड़ सिंह जूनियर ने ही चुरायी है. पुलिस है कि हाथ पे हाथ धरे बैठी है. अब मैं क्या करूँ? सोच रहा हूँ कि इस घटना के विरोध में अपने खेत में आग लगा लूँ. कैसा आयडिया है?

कल बंगलौर के कई इलाकों में कुछ ऐसा ही हुआ था जब सद्दाम हुसैन को फ़ाँसी दिये जाने के विरोध हुयी हिंसक वारदातों में कई लोग घायल हुये, वाहन क्षतिग्रस्त हुये और स्थिति तनावपूर्ण हो गयी. चाकू-छुरी लेकर विरोध करने वालों में अधिकांश किशोर थे. मुझे यह आपत्ति नहीं कि रोष क्यों व्यक्त किया गया, बल्कि इस बात का दु:ख है कि किस तरीके से रोष व्यक्त किया गया. अजीब तरीका है यह, और हम भारतीय इसमें अच्छे-खासे माहिर हैं. जाने वो कैसे लोग हैं जिनको जलते हुये देश की आग में सिकी रोटियों में स्वाद आता है!

10 Comments »

  1. अति-उत्तम विचार है।

    Comment by राम चन्द्र मिश्र — January 21, 2007 @ 3:24 am

  2. vyang se baat me dhaar aati hai, aap se seekh raha hun….

    Comment by Ravindra Bhartiya — January 21, 2007 @ 7:19 pm

  3. भाई यहाँ हमेशा से यही होता आया है,लोग दुसरों की तबाही का मंजर देखना पसंद करते हैं,मुझे लगता है शायद यह इस देश का संक्रमण काल है इसकारण ऐसी होड़ लगी है…

    Comment by Divyabh — January 21, 2007 @ 7:43 pm

  4. कब सुधरेंगे हम…. हा हा…नहीं सुधरेंगे हम… यही जवाब है मरे पास आज का स्थिती देखते हुये.. :)

    Comment by समीर लाल — January 22, 2007 @ 4:10 am

  5. बडी जल्दी जगे बैंगलोर के लोग, आगरे में लोग पहले उठ गये थे। अच्छा है जग गये कुछ दिन और हो जाती तो ना जाने क्या पता भुट्टो को फांसी दिये जाने पर बवाल मचा देते

    Comment by Tarun — January 22, 2007 @ 5:49 am

  6. प्रतीकात्मक कहानी बहुत मजेदार और संदेशपरक थी। कम शब्दों में ही सब कुछ कह गए आप।

    Comment by Shrish — January 23, 2007 @ 12:35 pm

  7. आप सभी का इस विषय पर विचार देने के लिये धन्यवाद. यह विडम्बना ही है कि हमारे देश में लोग स्वतंत्रता को स्वच्छंता समझते हैं और इस प्रकार अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं.

    Comment by अमित — January 23, 2007 @ 10:27 pm

  8. amit ji pranam. Jis roz ye ghatna ghati main usi roz aapke in panno ki taraf aaya thaa. Chaliye der aye durust aaye, aapne apni kalam kholi to sahi. Is paschimi samaaj main rahne ke baad mujhe kabhi ye samajh nahin aaya thaa ki kyon hum hindustaani pragrati ki daud main inse peeche hain? Hum mehanti hain, hum samajhdaar hain, humhaare paas kya nahin hai jo hum kamyaab nahin hote ? Jawaab hai Ekta. Na jaane kab sudhrenge hum aur kab bhai bhai ka gala kaatna band karega. Parantu Amit ji ye kucch panktiyaan jo bachpan main gaaya karta thaa aaj bhi saarthak lagti hain, na jaane kyon

    Hum honge kaamyaab
    Hum honge kaamyaab
    Hum honge kaamyaab ek din
    Ho ho Man main hai vishwaas
    poora hai vishwaas
    Hum honge kaamyaab ek din

    Nam chakshu sahit
    Nikhil

    Comment by Nikhil — January 26, 2007 @ 5:48 pm

  9. अमित जी, सवाल तो आपने बिल्कुल सही उठाया है, दर-असल यहां पर बात हल्की सी मनोविज्ञान पर आ जाती है, हम में से बहुत लोग ऐसे होते है जिन्हें दुसरो का नुकसान देख कर एक आत्मिक सुख हासिल होता है और इस सुख की मात्रा उस समय और भी बढ़ जाती है अगर वह नुकसान “सरकारी” हो।
    “खैर वह सुबह कभी तो आयेगी”… और “हम” ही लायेंगे वो सुबह
    शुभकामनाएं

    Comment by संजीत त्रिपाठी — February 14, 2007 @ 9:51 am

  10. सही कहा संजीत भाई आपने. पर इस प्रकार की स्थिति मनोवैज्ञानिक होने के साथ-साथ दूसरो के भड़कावे पर भी आती है.

    हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है. आशा है आपके चिट्ठे से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.

    Comment by अमित — February 14, 2007 @ 8:53 pm


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