गणतंत्र दिवस के अवसर पर फ़ैज़ की एक कविता जो उन्होंने अगस्त १९४७ में लिखी थी. यह कविता उस समय की आम मनो:स्थिति का रेखांकन बखूबी करती है, पर देखिये आज ६० वर्ष बाद भी दोनों देशों की परिस्थितियों के संदर्भ में उतनी ही प्रासंगिक है. क्यों? मेरे विचार से यदि गये साठ सालों में यह कविता अपनी प्रासंगिकता खो देती तो बेहतर होता!
सुबहे आज़ादी
ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहींये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिलजवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में
चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े
पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे-सहर की लगनबहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन
सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गामबदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर
निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारे हिज़्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निग़ारे-सबा किधर को गयी
अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहींअभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई
निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई– फ़ैज़ अहमद `फ़ैज़’




मंजिलें और भी हैं।
Comment by राम चन्द्र मिश्र — January 27, 2007 @ 1:02 am
वाकई आज भी प्रासंगिक है. यह पढ़ी हुई थी बहुत पहले, आज फिर पढ़कर ताजा हो गई. साधुवाद इसे पेश करने का.
Comment by समीर लाल — January 27, 2007 @ 3:05 am
हाँ वो सुबह तो नहीं आई पर बहुत कुछ बदला जरूर है…
फैज की इस रचना को बांटने का शुक्रिया !
Comment by मनीष — January 27, 2007 @ 7:03 am
अमीत भाई,आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्या है वो मात्र प्रश्न करना जानते हैं…जवाब नहीं है उनके पास…जिस संदर्भ को लेकर कविता पेश की गई है;निश्चय ही यह अब प्रासंगिकता खो रही है…आज हमारे आस पास बहुत कुछ बदला गया है…per capita income भी बड़ा है…भारत शिखर पथ पर है…और मंजिल पा ही लेगें…
Comment by Divyabh — January 27, 2007 @ 11:31 am
आप सभी का टिप्पणियों के लिये धन्यवाद.
यह बात बिलकुल सही है कि बहुत कुछ बदला है और बदल रहा है, नित नयी राहें रोशन हो रही हैं. पर हाँ, इन उजालों में अभी भी बहुत से दाग़ हैं यह बात भी स्वीकारनी होगी. इस दॄष्टि से फ़ैज़ की यह कविता वर्तमान परिस्थितियों में हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, और वर्तमान संदर्भ में यही इसकी प्रासंगिकता है. जिस दिन हमें आगे बढ़ने के लिये इस कविता से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी, यह कविता अपनी प्रासंगिकता खो देगी (पर सार्थकता नहीं!). उस दिन की प्रतीक्षा शायद हम सबको है.
Comment by अमित — January 28, 2007 @ 11:33 am