मसाला वॉटर
अपने देश में कौन ऐसे लाल की माई है जिसको अपनी चौका-बर्तन वाली से पड़ोसी के घर में चल रहे झगड़े का मसालेदार किस्सा सुनने में मज़ा न आता हो? अब शांताबाई को भी लगता होगा कि मेमसाब पगार बढ़ा देगी, इसीलिये वो और भी पका-पका के, मसाला लगा-लगा के किस्से सुनाती है.
सुना है वॉटर फिर से चर्चा में हैं. इस बार सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म के ऑस्कर के लिये कनाडा की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में वॉटर ने अंतिम पाँच में अपना स्थान बना लिया है. इसी बहाने और भी कई सारी फ़िरंगी मेमसाब हमारे घर की मसाला लगी-लगायी खबरें सुनकर आत्म-संतुष्टि के परम सुख को प्राप्त कर लेंगी. देश बेचने की दिशा में दीपा मेहता द्वारा की गयी यह एक सार्थक पहल है.
मेमसाब को फ़िल्म देखने से पहले ही खुश करने के लिये पापड़-चटनी की तरह मनु-स्मृति के उन अंशों को परोसा गया है जिनमें कहा गया है कि स्त्री को संयमित और पतिव्रता होना चाहिये. ऐसा करने वाली स्त्री को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और ऐसा न करने वाली स्त्री अगले जन्म में किसी जानवर की योनि में जन्म लेती है. इन अंशों को प्रस्तुत करते समय दीपा जी ने मनु-स्मृति के जिस अध्याय व श्लोक का उल्लेख किया है [अध्याय ५, श्लोक १५६-१६१], वह गलत है. हालांकि मनु-स्मृति में ऐसा कुछ अवश्य है, पर इन श्लोकों में नहीं. खैर, यह बात दीगर है. मैं यह नहीं समझ पाया कि दीपा जी और उनके दल को मनु-स्मृति में ही वर्णित वे श्लोक [अध्याय ३, श्लोक ५५-५८] क्यों नहीं दिखे जिनमें पतियों को अपनी पत्नी, पिताओं को अपनी पुत्री, और सभी पुरुषों को सभी स्त्रियों का सम्मान करने का निर्देश दिया गया है, और ऐसा न करने वाले पुरुषों के कुल के नाश की बात कही गयी है? निश्चित ही दीपा जी भारत के बारे में अनभिज्ञ पश्चिमी जनता के सामने ऐसा जतलाना चाहतीं थीं कि भारतीय ग्रंथ भी पुरुष को स्त्री के साथ भेदभाव करने का निर्देश देते हैं. हमारे यहाँ मनु-स्मृति से भी बहुत पुराने और सर्वमान्य ग्रंथ हैं जो हमारी संस्कृति, हमारी मूल सोच, हमारी परम्पराओं को अधिक सटीक ढंग से प्रस्तुत करते है. पर हाँ, उनमें दीपा जी को अपनी फ़िल्म में डालने लायक मसाला नहीं मिला होगा. दीपा जी यह भी भूल गयीं कि सती प्रथा के पनपने का कारण हमारे धार्मिक-ग्रंथ नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमण थे. विधवाओं का शारीरिक शोषण भारत में आम बात है, इस फ़िल्म में कई बार ऐसा भी दर्शाने का प्रयास किया गया है.
एक प्रश्न यह भी दिमाग़ में आता है कि वर्तमान समय में इस फ़िल्म की क्या सार्थकता है? फ़िल्म देखने के बाद भारत से अनभिज्ञ किसी भी व्यक्ति के मन में भारत में रह रही सभी विधवाओं के लिये तरस भाव, और पुरुषों के लिये घृणा भाव अवश्य उत्पन्न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये फ़िल्म के अन्त में यह लिखवा दिया गया है कि “भारत में ३ करोड़ ४० लाख विधवायें हैं और उनमें से अभी भी ढेर सारी मनु-स्मृति के कारण विषम परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रही हैं”. सोनिया जी तो निश्चित ही उनमें से नहीं हैं!
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कभी विसंगतियाँ रहीं हों, यह संभव है; पर कारण जाने बिना उन विसंगतियों का गायन करते रहना कैसी समझदारी है? भारत की संस्कृति और इससे जुड़े मुद्दों की गहरायी से समझ मुझमें शायद न हो, पर वॉटर देखकर इतना तो अवश्य कह सकता हूँ कि इस मामले में दीपा जी “कल्चरली कन्फ़्यूज़्ड” हैं; ए.बी.सी.डी. यानि अमृतसर बॉर्न कन्फ़्यूज़्ड दीपा!




Amit ji pranam. Bilkul sahi likha aapne. Dipa ji ne apne suvidha ke anusaar humhari sanskriti aur granthon ka jo arth nikal is pashcatya duniya ke saamne pesh kiya hai, usse desh bechne ki disha main pahla kadam hi kaha ja sakta hai.
Aisi khabarein/vichaar padh ke haal ke ek chal chitra Lage Raho Munna Bhai ka kaha hua ek dialogue yaad aata hai
“Desh to apna ho gaya, lekin log paraye ho gaye”
Nikhil
http://www.matrixconnects.com
Comment by Nikhil — February 19, 2007 @ 7:45 am