पिटारा भानुमती का

July 21, 2007

कुछ सपनों के मर जाने से

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 3:13 pm

कल राह चलते एक ऐसे व्यक्ति से भेंट हुई जिनके दोनों हाथ नहीं थे. उम्र होगी कोई ३५ वर्ष. पास आकर अंग्रेज़ी में बोले “प्लीज़ हेल्प, आई एम हैन्डीकैप्ड विद हैन्ड्स”. उनका आशय था कि मैं उन्हें कुछ रुपये दे दूँ. मैं सोचने लगा क्या परिस्थितियाँ सचमुच एक अच्छे-भले आदमी को इतना बेबस बना देती हैं कि वह हाथ फैलाने पर मजबूर हो जाये?

एक घटना याद आती है, जो अमेरिका के न्यायाधीश विलियम डगलस के साथ  हमारे ही देश में घटित हुई (उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की अंग्रेज़ी की इंटर की पाठ्य पुस्तक में इस घटना का वर्णन है). बात उन दिनों की है जब देश नया-नया आज़ाद हुआ था. विभाजन की त्रासदी से जूझ रहे कई परिवार दोनों ओर से सरहद पार कर अपनों से दूर अनजान हवाओं में सांस लेने पहुंच रहे थे, सिर्फ़ इस विश्वास के साथ कि वहाँ उनकी धार्मिक मान्यतायें अधिक सुरक्षित रह सकेंगी. डगलस महोदय उस समय दिल्ली से बरेली तक की रेलयात्रा कर रहे थे. नये देश की नब्ज़ टटोलने वे स्टेशनों पर उतरकर आम लोगों से  बात करते थे. रास्ते में कोई छोटा सा स्टेशन आया, डगलस उतरे और इतने में ही सरहद की दूसरी ओर से अपने परिवार के साथ आयी आठ-नौ साल की बच्ची उनके पास गुलदस्तों से भरी एक टोकरी लेकर आयी. उसने डगलस महोदय से कुछ गुलदस्ते खरीदने का आग्रह किया. बच्ची की स्थिति देखकर उन्हें तरस आया और उन्होंने पूरी टोकरी की कीमत पूछी. बच्ची ने खुशी-खुशी पूरा हिसाब लगा दिया. डगलस बच्ची को उतनी कीमत देकर बोले कि वे इतने सारे गुलदस्ते अपने साथ ले जाने में सक्षम नहीं हैं अत: वह बच्ची उनकी ओर से ये सारे गुलदस्ते उपहार स्वरूप रखे. बच्ची ने उनकी आँखों में झाँका और तुरंत यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया! डगलस भौंचक्के रह गये. जैसा कि उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा, उस बच्ची में उन्हें “भारत की सजीव आत्मा के दर्शन हुये”. विपरीत परिस्थितियों ने उस बच्ची को तोड़ा नहीं, बल्कि भविष्य में आने वाली चुनौतियों से जूझने की क्षमता प्रदान की. धन्य रहे होंगे वे माता-पिता जिनकी छत्र-छाया में बच्ची में ऐसे संस्कार आरोपित हुये.

मुझे कुछ ऐसा ही एक और अनुभव तब हुआ जब मैं एक सुपर-मार्केट में घूम रहा था. हाथ से बनाई हुयी कुछ पेंटिंग्स से सजे हुये कुछ बधाई-पत्रों ने मुझे सहज आकर्षित किया और मैंने कुछ बधाई-पत्र खरीद भी लिये. घर आकर इन बधाई-पत्रों को अलट-पलट कर देखा तो पता चला कि ये पेंटिंग्स हाथ से नहीं बनीं थीं क्योकि इन्हें बनाने वाले कलाकारों के हाथ तो थे ही नही! इन्हें बनाने वाली कम्पनी का नाम था “द माउथ एण्ड फ़ुट पेंटिंग्स आर्टिस्ट्स“. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं!

हम सबके जीवन में चुनौतियां आती ही हैं. कुछ बिखर जाते हैं, तो कुछ निखर जाते हैं. फ़र्क है सिर्फ़ जीवन के प्रति दृष्टिकोण का. नीरज की पंक्तियाँ “कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है” सचमुच कितनी सच्ची हैं.  बँटवारे के समय की वो बच्ची जिन्होंने डगलस महोदय और हम सबको जीवन की इतनी बड़ी सीख दी, आज दुनियाँ में हों, न हों, पर उनकी सोच जरूर जिन्दा है. यही सोच हमें बीते हुये कल की छाया आज पर न डालकर अपने आज की रोशनी से आने वाले कल को रोशन करने की प्रेरणा देती रहेगी.

10 Comments »

  1. बहुत अच्छा लेख, वाकई जिंदगी संघर्षों में लड़ते रहने का ही नाम है।

    Comment by Shrish — July 21, 2007 @ 4:45 pm

  2. अच्छा लिखा है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जहां लोगों ने विकलांगता को मात दी है। हां, इसके लिए बुलंद हौसले की जरूरत है

    Comment by Satyendra — July 21, 2007 @ 4:51 pm

  3. बहुत ही प्रेरणास्पद

    Comment by सागर चन्द नाहर — July 21, 2007 @ 5:12 pm

  4. मुझे भारत पर विश्वास है. मुझे भारत के लोगों पर विश्वास है. इतिहास ने हमें छला हो, लेकिन भविष्य को हम अपना बनायेंगे

    Comment by भारतवासी — July 21, 2007 @ 5:26 pm

  5. बहुत बढिया लेख है।बधाई।

    Comment by paramjitbali — July 21, 2007 @ 11:46 pm

  6. बड़े सलीके से आपने अपने विचारों को रखा है। प्रेरणापद लेख !

    Comment by मनीष — July 22, 2007 @ 6:39 am

  7. ऐसी बातो से हौसला मिलता है

    Comment by हरिमोहन सिंह — July 22, 2007 @ 10:44 am

  8. [...] लेख और अमित जी खुले पन्ने के लिखे  कुछ सपनों के मर जाने से  नामक प्रेरणास्पद लेख को पढ़ने के [...]

    Pingback by घीसू माधव और मुंबई का वह पोलिश वाला « ॥दस्तक॥ — July 22, 2007 @ 6:11 pm

  9. बहुत बढ़िया प्रेरणास्पद. बधाई.

    Comment by समीर लाल — July 27, 2007 @ 7:54 pm

  10. बहुत ही प्रेरणादायक

    Comment by Shastri JC Philip — August 5, 2007 @ 3:07 pm

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