सुबह का समय; और इस बार यात्रा दिल्ली और आगरा के बीच। ताज एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी कुर्सी यान में खिड़की वाली कुर्सी पर बैठा हूँ मैं। संदेह होता है कहीं अनारक्षित डिब्बा तो नहीं है ये! मुझे मुंबई लोकल के अनुभवों की याद आ रही है। एक युवा जोड़े का आगमन होता है, उनकी आरक्षित कुर्सी घेरी जा चुकी है; इस देश में कुर्सी की ताकत बहुत है! पत्नी जी कुर्सीखोरों से कुर्सी को मुक्त कराने का प्रयास करती हैं। “तो हम कहाँ बैठें बहनजी”? इतने विचारपूर्ण तर्क से पत्नी जी तिलमिला जाती हैं और गाँधीवादी शैली में कहतीं हैं, यहीं बैठो! कुर्सीखोर खटमल की तरह अब भी कुर्सी से चिपके हुये हैं!
गाड़ी अब तुगलकाबाद के पास के नाले और कचरे के ढेर को पार कर रही है। आई.आई.एम. वालों को कचरा मैनेजमेंट में भी एक कोर्स रखना चाहिये! कचरे से ईंधन बन जाता है, बहुत सुन रखा है। अगर हमारी सरकार को भी सुनाई दे जाता तो न्यूक्लियर डील की नौबत न आती और सरकार को ये दिन नहीं देखना पड़ता। गाड़ी कचरों के ऐसे कई ढेरों को पार करती चली आ रही है और मैं निठल्ला चिंतन में व्यस्त हूँ। कचरों के इस धुंध में एक किरण आती है और फ़रीदाबाद का पी.वी.आर. सिनेमा दिखाई देता है। कचरे और पी.वी.आर. में बस आँखों के लेंस की फ़ोकल लेंथ को एडजस्ट करने भर की दूरी है! “यूनिटी इन डायवर्सिटी” का इससे अच्छा उदाहरण कहाँ मिलेगा।
तभी टिकट चेकर साहब का आगमन होता है। मेरे हृदय में बेटिकट और अनारक्षित यात्रियों के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है, “चलो अच्छा है, भीड़ कम होगी”। अगले ही क्षण मुझ में स्वयं के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है क्योंकि टी.सी. साहब बहुत दयालु हैं और सबका काम पक्का करते जा रहे हैं! भला हो इस देश का।
अब नाश्ते का समय हो चला है और पेट में चूहे दौड़ने लगे हैं। मैं एक बिस्किट, चिप्स और ‘ठंडा बिसलरी’ खरीद लेता हूँ। तभी अगली कुर्सी वाले सज्जन बीड़ी सुलगा लेते हैं, मेरे प्रतिरोध करने पर बंद तो कर देते हैं, पर अपनी आँखों से मुझे जता देते हैं कि मेरे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया जा रहा है।
अब मेरे चिप्स खत्म हो चुके हैं। चिप्स का पैकेट कितना ही बड़ा क्यों न हो, हमेशा छोटा ही लगता है। हिन्दी में वो कहावत है न, “नो वन कैन ईट जस्ट वन्स”! पैकेट खाली है और अपनी नियति जानता है, पटरी मिलाप! पर मैं एक सभ्य नागरिक हूँ, ऐसा नहीं होने दूँगा, किसी कूड़ेदान में ही डालूँगा। यही सोचकर उसे अपने बस्ते की आगे वाली जेब में रख लेता हूँ।
अब आगरा का राजा की मण्डी स्टेशन आ चुका है, मैं एक कूड़ेदान की तलाश में हूँ, मेरी कोशिश असफल रहती है!
दो दिन बाद मैं वापस दिल्ली जाने के लिये प्लेटफ़ार्म पर खड़ा गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सहसा बस्ते की आगे वाली जेब में हाथ जाता है। चिप्स के पैकेट का स्पर्श होते ही मैं कूड़ेदान की खोज में पूरा प्लेटफ़ार्म खोज मारता हूँ। एक बार फिर मेरी कोशिश असफल रहती है!
“अगर मुझे पटरी पर ही फेंक दिया होता तो कम से कम खुली हवा में साँस तो ले रहा होता, ये बस्ते में तो नहीं सड़ना पड़ता”! मैं चिप्स के पैकेट के समक्ष लज्जित हो जाता हूँ!



