बहुत दिन बाद लौटा हूँ; इस चिट्ठे पर, और इस शहर में। मुंबई को अपने जीवन के छ: वर्ष दिये और बदले में मिला जीवन में कुछ भी कर गुज़र जाने का विश्वास, एक हौसला।
गये बरसों में बहुत कुछ बदल गया। कुछ ऊँची इमारतें उगने लगीं, ठीक उसी जगह जहाँ किसी की छत धँसी थी। ये किसी उजड़े हुए, किसी गुज़रे हुए काफ़िले का ग़ुबार है या कंक्रीट में से झरती हुई धूल?
और कहाँ गई चर्चगेट स्टेशन के पास की वो जगह जहाँ बेघर हुई किताबें किसी की राह तकती थीं, अपना नया आशियां ढूँढती थीं? अभी किसी कोने में धूल की चादर ओढ़े सिसक रही होंगी शायद!
धूल उड़ती हुई, धूल जमती हुई… इतनी ही धूल थी इस शहर में तो क्या बुरे थे दूर गाँव में दीदी के धूल भरे पाँव, कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव?
– (धर्मवीर भारती जी ने ‘दीदी के धूल भरे पाँव’ १९५९ में अपने मुंबई आगमन पर लिखी थी।)




been a mumbaikar.. i felt the words more deeeply..
nice text…
Comment by poddisc9 — अगस्त 9, 2010 @ 11:40 पूर्वाह्न |
Ye kitaab parni padegi. Dhanyawaad.
Comment by nishantchandgotia — अगस्त 16, 2010 @ 1:35 अपराह्न |
meri agyanta par mujhe maaf kariyaga. mujhe laga aisi koi gadya hai.
Aapke bhaavon mein mujhe apne bhaavon ki parchayee dikhayee deti hai. Wah bhaav jo kabhi mujeh mere ekant mein cherta hua chala jaata hai.
Comment by nishantchandgotia — अगस्त 16, 2010 @ 1:43 अपराह्न |
bhai likhnna jari rakhiye kyonki badhiya likhate hain aap.
Comment by santosh pandey — नवम्बर 25, 2010 @ 8:17 अपराह्न |