कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
मान लीजिये समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आपके ऊपर भरोसा करता है, आप प्रतिष्ठित हैं और आपकी विश्वसनीयता इतनी है कि लोग आपकी बात का सत्यापन करने का प्रयास तक नहीं करते. ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? क्या आप लोगों को लुभाने वाली मनगढ़ंत बातें और व्याख्याएं बताकर उनमें और भी लोकप्रिय होना चाहेंगे या अपने ऊपर एक जिम्मेदारी का आभास कर संयम से काम लेंगे?
चलिये अब आगे बढ़ने से पहले देखिये यह वीडियो जिसमें डॉ. ज़ाकिर नाइक ने बहुपत्नी प्रथा की वकालत करने का प्रयास किया है. मैं स्पष्ट कर दूँ कि इस लेख का उद्देश्य बहुपत्नी प्रथा की विवेचना करना नहीं, बल्कि इस संभावना की ओर इंगित करना है कि एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उसकी सुविधानुसार की गयी व्याख्याएं एक बड़े जन-समूह पर प्रभाव डालती हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि तर्क बड़े लुभावने हैं और अन्त में डॉक्टर साहब ने “पब्लिक प्रॉपर्टी” जैसे “सॉफ़िस्टिकेटेड” शब्द का इस्तेमाल कर जनता की वाहवाही भी खूब बटोरी है. पर क्या है इन तर्कों के पीछे का सच? आइये नज़र डालते हैं.
पहले तो ये कि ज़ाकिर साहब ने जो सांखिकीय आंकड़े दिये उनमें से अधिकांश ठीक नहीं हैं! उदाहरण के लिये जर्मनी में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से ५० लाख नहीं, १५ लाख अधिक है और यूनाइटेड किंगडम में यह अंतर ४० लाख नहीं, करीब साढ़े छह लाख ही है. खैर मुद्दे की बात यह नहीं है. मुख्य बात यह है कि इस प्रकार के तर्कों में आयु के अनुसार पुरुषों और स्त्रियों की संख्या, और साथ ही पुरुषों तथा स्त्रियों के अलग अलग औसत जीवन काल का बहुत महत्व है. अब जर्मनी ही लीजिये. यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से करीब १५ लाख अधिक है परन्तु ६५ वर्ष से अधिक आयु की स्त्रियों की संख्या ६५ वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों की संख्या के मुकाबले करीब २८ लाख अधिक है! कारण स्पष्ट है - महिलाओं का औसत जीवन काल अधिक होना. विश्व के लगभग सभी देशों में महिलायें पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक जीती हैं. इस प्रकार जर्मनी में १५ बर्ष से ६४ वर्ग के आयु समूह में महिलाओं की अपेक्षा १० लाख पुरुष अधिक हैं और डॉक्टर साहब जर्मनी में बहुपत्नीय समाज व्यवस्था की बात कह रहे हैं! अपने देश के संदर्भ में तो यह चर्चा करना और भी अर्थहीन हो जाता है. अजीब बात है कि इतनी सारी गणना करने में उन्होनें समलैंगिकों का तो ध्यान रखा पर इतनी महत्वपूर्ण बातें भूल गये.
किसी भी स्वस्थ जनसंख्या में ० से लेकर १४ वर्ष के आयु वर्ग में प्रति १०० लड़कियों पर औसतन १०५ लड़के होते हैं. उसके बाद यह अंतर और भी कम होता जाता है. आमतौर पर स्त्रियों का जीवन काल पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है, और कई बार यह अंतर इतना बड़ा होता है कि कुल आबादी में स्त्रियों की संख्या अधिक हो सकती है. जैसे कि रूस में महिलाओं का औसत जीवन काल है ७४ वर्ष और पुरुषों का मात्र ६१ बर्ष, और इस प्रकार ६५ वर्ष से अधिक आयु वर्ग में केवल ३१% पुरुष हैं - यानि इस आयु वर्ग में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या के दूने से भी अधिक!
यह तो रही सांखिकीय और आंकड़ों पर आधारित तर्कों की बात, पर जीवन में इससे भी अधिक गहरे और महत्वपूर्ण विषय हैं. उनकी व्याख्याएं प्रतिष्ठित व्यक्ति जिम्मेदारियों से साथ करते होंगे, ऐसी अपेक्षा है.
(इस लेख में सभी आंकड़े नवीनतम हैं और सी.आई.ए. से लिये गये है).





