हिन्दी सिनेमा में जब भी संवादों की बात निकलती है तब शोले फ़िल्म की याद आने लगती है. गब्बर सिंह का “कितने आदमी थे” से लेकर “बहूत याराना लगता है“, हर एक डायलॉग कोई भी सिनेमाप्रेमी आपको चुटकियों में सुना देगा.
साठ के दशक की शुरुआत में बनी के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म. इस फ़िल्म को “कार्य के प्रति समर्पण” का अनूठा उदाहरण माना जा सकता है. फ़िल्म तो पूरी बनकर १९६० में ही रिलीज़ हो सकी, परन्तु के. आसिफ़ ने १९४४ से ही इस फ़िल्म को बनाने की ठान ली थी, और उस समय उनकी उम्र थी मात्र २० वर्ष! मुग़ल-ए-आज़म के संवादों ने अपनी खूबसूरती के कारण मेरे ऊपर अमिट छाप छोड़ी है और आज उन्हीं की चर्चा. यह स्मृति के आधार पर है, अत: संवादों के कुछ शब्दों में हेर-फेर संभव है.
- “शहंशाह की बेहिसाब बख्शीशों के बदले ये कनीज़ जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को अपना खून माफ़ करती है.” – अनारकली (अकबर से)
- “जनाज़ा रुख़सत की इजाज़त चाहता है“. – अनारकली (अकबर से); इससे मिलता जुलता भाव नई उमरावजान (२००६) के गीत “पूछ रहे हैं पूछने वाले” की आरंभिक पंक्तियों में मिलता है (“अब जनाज़े को तो रुख़सत की इजाज़त मिल जाये”)
- “खय्याम की शायरी अगर किसी पत्थर पर लिख दी जाये तो क्या उसके मायने बदल जायेंगे?” सलीम (दुर्जन से)
- “का़तिल ही नही, दिलदार भी है, शाख़-ए-गुल भी है, तलवार भी है.“ - सलीम (दुर्जन से, अपनी तलवार के बारे में)
- “हम अपने बेटे के धड़कते हुए दिल के लिये हिन्दुस्तान की तकदीर नहीं बदल सकते.” – अकबर (जोधाबाई से?)
- “हम मोहब्बत के दुश्मन नहीं, अपने उसूलों के ग़ुलाम हैं.” – अकबर (जोधाबाई से?)
- “मोहब्बत करके देखिये, डर भाग जायेगा.” – सुरैया [अनारकली की बहन] (दुर्जन से)
- “कदम बोसी को राहें मुन्तज़िर हैं.” – बहार (अकबर से)
और अन्त में… पूरी फ़िल्म में मेरी सबसे प्रिय पंक्ति:
“कांटों को मुरझाने का खौफ़ नहीं होता !” – अनारकली (सलीम से).






