पिटारा भानुमती का

April 23, 2007

प्रयाग में सूर्यास्त

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 4:48 pm

अभी काम के सिलसिले में प्रयाग जाना हुआ. सौभाग्य से मैं गंगा के पास ही ठहरा था. गंगा में सूरज को डूबते देखना विलक्षण अनुभव रहा; मानो थका-हारा सूरज किसी घाट पर हाथ-मुँह धोने आया हो.

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आप भी देखिये यह नज़ारा.

March 4, 2007

जीवन के रंग

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:21 pm

होली बीत गयी. आशा है होली ने सबके जीवन में नया रंग भरा होगा. पर उनका क्या जो रंगों को सिर्फ़ छू सकते हैं देख नहीं सकते? उनके जीवन में रंग कौन भरेगा? शायद मैं और आप!

एक अच्छा संदेश इतने बेहतरीन ढंग से देने के लिये कोड रेड फ़िल्म्स को बधाई.

February 16, 2007

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 3:31 am

मान लीजिये समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आपके ऊपर भरोसा करता है, आप प्रतिष्ठित हैं और आपकी विश्वसनीयता इतनी है कि लोग आपकी बात का सत्यापन करने का प्रयास तक नहीं करते. ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? क्या आप लोगों को लुभाने वाली मनगढ़ंत बातें और व्याख्याएं बताकर उनमें और भी लोकप्रिय होना चाहेंगे या अपने ऊपर एक जिम्मेदारी का आभास कर संयम से काम लेंगे?

चलिये अब आगे बढ़ने से पहले देखिये यह वीडियो जिसमें डॉ. ज़ाकिर नाइक ने बहुपत्नी प्रथा की वकालत करने का प्रयास किया है. मैं स्पष्ट कर दूँ कि इस लेख का उद्देश्य बहुपत्नी प्रथा की विवेचना करना नहीं, बल्कि इस संभावना की ओर इंगित करना है कि एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उसकी सुविधानुसार की गयी व्याख्याएं एक बड़े जन-समूह पर प्रभाव डालती हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि तर्क बड़े लुभावने हैं और अन्त में डॉक्टर साहब ने “पब्लिक प्रॉपर्टी” जैसे “सॉफ़िस्टिकेटेड” शब्द का इस्तेमाल कर जनता की वाहवाही भी खूब बटोरी है. पर क्या है इन तर्कों के पीछे का सच? आइये नज़र डालते हैं.

पहले तो ये कि ज़ाकिर साहब ने जो सांखिकीय आंकड़े दिये उनमें से अधिकांश ठीक नहीं हैं! उदाहरण के लिये जर्मनी में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से ५० लाख नहीं, १५ लाख अधिक है और यूनाइटेड किंगडम में यह अंतर ४० लाख नहीं, करीब साढ़े छह लाख ही है. खैर मुद्दे की बात यह नहीं है. मुख्य बात यह है कि इस प्रकार के तर्कों में आयु के अनुसार पुरुषों और स्त्रियों की संख्या, और साथ ही पुरुषों तथा स्त्रियों के अलग अलग औसत जीवन काल का बहुत महत्व है. अब जर्मनी ही लीजिये. यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से करीब १५ लाख अधिक है परन्तु ६५ वर्ष से अधिक आयु की स्त्रियों की संख्या ६५ वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों की संख्या के मुकाबले करीब २८ लाख अधिक है! कारण स्पष्ट है – महिलाओं का औसत जीवन काल अधिक होना. विश्व के लगभग सभी देशों में महिलायें पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक जीती हैं. इस प्रकार जर्मनी में १५ बर्ष से ६४ वर्ग के आयु समूह में महिलाओं की अपेक्षा १० लाख पुरुष अधिक हैं और डॉक्टर साहब जर्मनी में बहुपत्नीय समाज व्यवस्था की बात कह रहे हैं! अपने देश के संदर्भ में तो यह चर्चा करना और भी अर्थहीन हो जाता है. अजीब बात है कि इतनी सारी गणना करने में उन्होनें समलैंगिकों का तो ध्यान रखा पर इतनी महत्वपूर्ण बातें भूल गये.

किसी भी स्वस्थ जनसंख्या में ० से लेकर १४ वर्ष के आयु वर्ग में प्रति १०० लड़कियों पर औसतन १०५ लड़के होते हैं. उसके बाद यह अंतर और भी कम होता जाता है. आमतौर पर स्त्रियों का जीवन काल पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है, और कई बार यह अंतर इतना बड़ा होता है कि कुल आबादी में स्त्रियों की संख्या अधिक हो सकती है. जैसे कि रूस में महिलाओं का औसत जीवन काल है ७४ वर्ष और पुरुषों का मात्र ६१ बर्ष, और इस प्रकार ६५ वर्ष से अधिक आयु वर्ग में केवल ३१% पुरुष हैं – यानि इस आयु वर्ग में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या के दूने से भी अधिक!

यह तो रही सांखिकीय और आंकड़ों पर आधारित तर्कों की बात, पर जीवन में इससे भी अधिक गहरे और महत्वपूर्ण विषय हैं. उनकी व्याख्याएं प्रतिष्ठित व्यक्ति जिम्मेदारियों से साथ करते होंगे, ऐसी अपेक्षा है.

(इस लेख में सभी आंकड़े नवीनतम हैं और सी.आई.ए. से लिये गये है).

February 14, 2007

वैलेण्टाइन दिवस : एक सुविचार

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:09 pm

फ़ैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें.

-भूल चूक लेनी देनी.

(कृपया उपरोक्त टिप्पणीनुमा विचार को ही पोस्ट की मान्यता प्रदान करें).

February 3, 2007

मसाला वॉटर

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 2:01 am

अपने देश में कौन ऐसे लाल की माई है जिसको अपनी चौका-बर्तन वाली से पड़ोसी के घर में चल रहे झगड़े का मसालेदार किस्सा सुनने में मज़ा न आता हो? अब शांताबाई को भी लगता होगा कि मेमसाब पगार बढ़ा देगी, इसीलिये वो और भी पका-पका के, मसाला लगा-लगा के किस्से सुनाती है.

सुना है वॉटर फिर से चर्चा में हैं. इस बार सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म के ऑस्कर के लिये कनाडा की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में वॉटर ने अंतिम पाँच में अपना स्थान बना लिया है. इसी बहाने और भी कई सारी फ़िरंगी मेमसाब हमारे घर की मसाला लगी-लगायी खबरें सुनकर आत्म-संतुष्टि के परम सुख को प्राप्त कर लेंगी. देश बेचने की दिशा में दीपा मेहता द्वारा की गयी यह एक सार्थक पहल है.

मेमसाब को फ़िल्म देखने से पहले ही खुश करने के लिये पापड़-चटनी की तरह मनु-स्मृति के उन अंशों को परोसा गया है जिनमें कहा गया है कि स्त्री को संयमित और पतिव्रता होना चाहिये. ऐसा करने वाली स्त्री को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और ऐसा न करने वाली स्त्री अगले जन्म में किसी जानवर की योनि में जन्म लेती है. इन अंशों को प्रस्तुत करते समय दीपा जी ने मनु-स्मृति के जिस अध्याय व श्लोक का उल्लेख किया है [अध्याय ५, श्लोक १५६-१६१], वह गलत है. हालांकि मनु-स्मृति में ऐसा कुछ अवश्य है, पर इन श्लोकों में नहीं. खैर, यह बात दीगर है. मैं यह नहीं समझ पाया कि दीपा जी और उनके दल को मनु-स्मृति में ही वर्णित वे श्लोक [अध्याय ३, श्लोक ५५-५८] क्यों नहीं दिखे जिनमें पतियों को अपनी पत्नी, पिताओं को अपनी पुत्री, और सभी पुरुषों को सभी स्त्रियों का सम्मान करने का निर्देश दिया गया है, और ऐसा न करने वाले पुरुषों के कुल के नाश की बात कही गयी है? निश्चित ही दीपा जी भारत के बारे में अनभिज्ञ पश्चिमी जनता के सामने ऐसा जतलाना चाहतीं थीं कि भारतीय ग्रंथ भी पुरुष को स्त्री के साथ भेदभाव करने का निर्देश देते हैं. हमारे यहाँ मनु-स्मृति से भी बहुत पुराने और सर्वमान्य ग्रंथ हैं जो हमारी संस्कृति, हमारी मूल सोच, हमारी परम्पराओं को अधिक सटीक ढंग से प्रस्तुत करते है. पर हाँ, उनमें दीपा जी को अपनी फ़िल्म में डालने लायक मसाला नहीं मिला होगा. दीपा जी यह भी भूल गयीं कि सती प्रथा के पनपने का कारण हमारे धार्मिक-ग्रंथ नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमण थे. विधवाओं का शारीरिक शोषण भारत में आम बात है, इस फ़िल्म में कई बार ऐसा भी दर्शाने का प्रयास किया गया है.

एक प्रश्न यह भी दिमाग़ में आता है कि वर्तमान समय में इस फ़िल्म की क्या सार्थकता है? फ़िल्म देखने के बाद भारत से अनभिज्ञ किसी भी व्यक्ति के मन में भारत में रह रही सभी विधवाओं के लिये तरस भाव, और पुरुषों के लिये घृणा भाव अवश्य उत्पन्न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये फ़िल्म के अन्त में यह लिखवा दिया गया है कि “भारत में ३ करोड़ ४० लाख विधवायें हैं और उनमें से अभी भी ढेर सारी मनु-स्मृति के कारण विषम परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रही हैं”. सोनिया जी तो निश्चित ही उनमें से नहीं हैं!

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कभी विसंगतियाँ रहीं हों, यह संभव है; पर कारण जाने बिना उन विसंगतियों का गायन करते रहना कैसी समझदारी है? भारत की संस्कृति और इससे जुड़े मुद्दों की गहरायी से समझ मुझमें शायद न हो, पर वॉटर देखकर इतना तो अवश्य कह सकता हूँ कि इस मामले में दीपा जी “कल्चरली कन्फ़्यूज़्ड” हैं; ए.बी.सी.डी. यानि अमृतसर बॉर्न कन्फ़्यूज़्ड दीपा!

January 26, 2007

वो मंज़िल अभी नहीं आई

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:22 pm

गणतंत्र दिवस के अवसर पर फ़ैज़ की एक कविता जो उन्होंने अगस्त १९४७ में लिखी थी. यह कविता उस समय की आम मनो:स्थिति का रेखांकन बखूबी करती है, पर देखिये आज ६० वर्ष बाद भी दोनों देशों की परिस्थितियों के संदर्भ में उतनी ही प्रासंगिक है. क्यों? मेरे विचार से यदि गये साठ सालों में यह कविता अपनी प्रासंगिकता खो देती तो बेहतर होता!

सुबहे आज़ादी

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में
चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े
पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे-सहर की लगन

बहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन
सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गाम

बदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर
निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारे हिज़्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निग़ारे-सबा किधर को गयी
अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई
निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

– फ़ैज़ अहमद `फ़ैज़’

January 21, 2007

कब सुधरेंगे हम?

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:35 am

मेरे पड़ोसी रामलाल की भैंस चोरी हो गयी है. मुझे पक्का पता है कि पास के गाँव रईसपुर के पूर्व प्रधान झाड़ सिंह के बेटे झाड़ सिंह जूनियर ने ही चुरायी है. पुलिस है कि हाथ पे हाथ धरे बैठी है. अब मैं क्या करूँ? सोच रहा हूँ कि इस घटना के विरोध में अपने खेत में आग लगा लूँ. कैसा आयडिया है?

कल बंगलौर के कई इलाकों में कुछ ऐसा ही हुआ था जब सद्दाम हुसैन को फ़ाँसी दिये जाने के विरोध हुयी हिंसक वारदातों में कई लोग घायल हुये, वाहन क्षतिग्रस्त हुये और स्थिति तनावपूर्ण हो गयी. चाकू-छुरी लेकर विरोध करने वालों में अधिकांश किशोर थे. मुझे यह आपत्ति नहीं कि रोष क्यों व्यक्त किया गया, बल्कि इस बात का दु:ख है कि किस तरीके से रोष व्यक्त किया गया. अजीब तरीका है यह, और हम भारतीय इसमें अच्छे-खासे माहिर हैं. जाने वो कैसे लोग हैं जिनको जलते हुये देश की आग में सिकी रोटियों में स्वाद आता है!

January 8, 2007

एक पेड़

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:00 am

एक खूबसूरत सा पेड़ जिसके दिन की शुरुआत किसी कोयल के मधुर गीत से नहीं होती, बल्कि यह तो हमेशा सहमा-सहमा रहता है. गाज़ा पट्टी के इलाके में खड़ा है यह!

पता नहीं कब बारूद के ढेर इसको राख कर दें! बस आसमान में बाँहें फैलाये दुआ ही माँग सकता है – अपने लिये, उन मासूमों के लिये जो स्कूल से लौटते वक्त इसकी छाँह में खेला करते थे कभी, और उनके लिये जिनसे इसकी कोई रंजिश तो नहीं पर फिर भी इसकी जान के दुश्मन बने हैं.

यह चित्र मैंने एट्रियम चित्र प्रदर्शनी (दिसम्बर २००६) में अपने कैमरे में उतारा था. चित्र लेने की अनुमति देने के लिये आयोजकों का धन्यवाद.

January 5, 2007

दो नैना एक कहानी

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:53 am

उत्तरी इटली का एक शहर ट्यूरिन. घूमते-घूमते एक चौक पर गया तो पाया कि खुले आकाश के नीचे खडी़ कई तस्वीरें मुझे अपने पास बुला रही हैं. अधिकांश तस्वीरें एशियाई और अफ़्रीकी देशों में ली गयीं थीं और उनमें चेहरे के कई भावों को उकेरने का प्रयास किया गया था. नीचे वाली तस्वीर है मुंबई में दो वक्त की रोटी की तलाश करती दो मासूम आँखों की.

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मुझे एक बात समझ नहीं आयी – यूरोपीय छायाचित्रकारों को कला की तलाश में गरीब देशों में क्यों आना पड़ा? क्या पेरिस की गलियों या न्यूयार्क की बहुमंजिला इमारतों में मानवीय चेहरों पर भावों का अभाव है? बिना पैसे दिये मॉडल, और वह भी स्वाभाविक, भला गरीब देशों में ही मिल सकते हैं (इसीलिये तो वे देश गरीब हैं!). अब है किसी की हिम्मत जो किसी यूरोपीय शहर में भीख माँगते किसी व्यक्ति की तस्वीर खींच सके बिना पैसे दिये!

October 15, 2006

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 11:56 am

इंटरनेट पर टहलते-टहलते एक दिल दहला देने वाला समाचार मिला. आपको याद होगा आज से करीब दो साल पहले भारत में धनंजय चटर्जी को फ़ाँसी दी गयी थी. करीब-करीब उसी समय ईरान में एक १६ वर्षीय लड़की अतफ़ा सहाले को फ़ाँसी देने की तैयारियां चल रहीं थीं, वह भी सार्वजनिक स्थान पर क्रेन से लटकाकर! और यह सब आधिकारिक रूप से. उसका अपराध – ईरान के इस्लामिक कानून को चुनौती देते हुए किसी पुरुष से संबंध रखकर अपवित्र कार्य करना और दो बार उसके फ़ैसले की सुनवाई कर रहे धार्मिक जज के विरोध में अदालत में अपना बुरका उतार फेंकना. और हाँ, जिस पुरुष ने उसको अपने साथ इन संबंधों पर मजबूर किया उसको भी सज़ा सुनायी गयी -९५ कोड़े की! वह आखिर पुरुष जो था.

बचपन से ही अतफ़ा को इस्लामी तौर तरीके रास नहीं आये. उसको जीन्स पहनकर डांस करना भाता था, तो उसके मित्र उसको माधुरी (दीक्षित) कहते थे. उसे गैर-इस्लामिक पोशाक में अपने मित्रों के साथ रेस्तरां जाना और घूमना पसंद था. इस प्रकार वह आस-पास की सादी वेश-भूषा में सड़कों पर टहलते रहने वाली नैतिक पुलिस की नज़र में आ गयी, जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि सब कुछ इस्लामी कानून के हिसाब से चले. सब कुछ कानून के हिसाब से चले इसीलिये तो अदालत मे उसकी उम्र १६ की जगह २२ वर्ष लिखी गयी जिससे कि उसको वयस्क घोषित कर सज़ा देने में कोई मुश्किल न आये. इस धोखाधड़ी से अतफ़ा के घरवाले उसके फ़ाँसी हो जाने तक अनभिज्ञ रहे.

फ़ाँसी की सज़ा ईरान में आम बात है. विश्व में चीन के बाद ईरान ऐसा देश है जहाँ सबसे अधिक संख्या में लोगों को फ़ाँसी दी जाती है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष चीन में यह संख्या १७७० थी और ईरान में ९४. जब फ़ाँसियां इतनी अधिक दी जायें तो निश्चित ही बहुत से लोग ऐसे भी होते होंगें जिन्हें अपने देश के तंत्र का शिकार होना पड़ता होगा. आज भी ईरान में कई ऐसी स्त्रियां हैं जिन पर इस्लाम विरोधी आचरण के मुकदमे अदालतों में पड़े हैं और वे न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं. पता नहीं इनमें और कितनी अतफ़ा हों?

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