बाबुल की “दुआयें”
“बाबुल की दुआयें लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले…”. लेकिन क्या बीतती होगी उस स्त्री पर जिसका पति कोई इंसान नहीं बल्कि कोई धार्मिक पुस्तक अथवा वॄक्ष है! यह कोरी कल्पना मात्र नहीं, यथार्थ है. दिल दहला देने वाले इस यथार्थ से कल इंटरनेट पर भेंट हुई, आप भी वीडियो देखिये.
क्या किसी के लिये अपनी ही पुत्री का जीवन इतना बेमानी है? हम भारतीय भी इसमें पीछे नहीं. देवदासी प्रथा को कौन नहीं जानता. भारत के कई कोनों में आज भी देवदासियां मौज़ूद हैं. माता-पिता ही अपनी पुत्रियों का जीवन किसी देवता तो समर्पित कर देते हैं. कैसा समर्पण है यह? अपना बोझ हल्का करने को समर्पण नाम दे दिया जाता है. आखिर कितनी स्त्रियां स्वेच्छा से देवदासियां बनती हैं? विकीपीडिया के अनुसार बहुत सारे मामलों में परिवार में किसी लड़के की गै़र-मौज़ूदगी की स्थिति में माता-पिता अपनी पुत्री को पुत्र घोषित कर उसको अपनी आमदनी का माध्यम बनाते है, और इस तरह परिवार की बाकी जायदाद भी बचा लेते हैं.
इसी संदर्भ में याद आती है अपर्णा सेन की एक बंगाली फ़िल्म ‘सती‘. उन्नीसवीं सदी की पॄष्ठभूमि में बनी इस फ़िल्म में प्रमुख नायिका उमा (शबाना आज़मी) का विवाह एक वृक्ष के साथ कर दिया जाता है. फ़िल्म का अंत तो बहुत ही मार्मिक और संकेतात्मक है.
मैं सोचता हूं कि क्या यह वही भारतभूमि है जहां सदियों से “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैस्तु न पूज्यन्तेसर्वस्तत्रफला: क्रिया:” की गूंज सुनायी देती आ रही है?
सम्बंधित कड़ी: देवदासी प्रथा पर एक शोधपत्र



