पिटारा भानुमती का

August 3, 2006

बाबुल की “दुआयें”

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 1:13 pm

“बाबुल की दुआयें लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले…”. लेकिन क्या बीतती होगी उस स्त्री पर जिसका पति कोई इंसान नहीं बल्कि कोई धार्मिक पुस्तक अथवा वॄक्ष है! यह कोरी कल्पना मात्र नहीं, यथार्थ है. दिल दहला देने वाले इस यथार्थ से कल इंटरनेट पर भेंट हुई, आप भी वीडियो देखिये.

क्या किसी के लिये अपनी ही पुत्री का जीवन इतना बेमानी है? हम भारतीय भी इसमें पीछे नहीं. देवदासी प्रथा को कौन नहीं जानता. भारत के कई कोनों में आज भी देवदासियां मौज़ूद हैं. माता-पिता ही अपनी पुत्रियों का जीवन किसी देवता तो समर्पित कर देते हैं. कैसा समर्पण है यह? अपना बोझ हल्का करने को समर्पण नाम दे दिया जाता है. आखिर कितनी स्त्रियां स्वेच्छा से देवदासियां बनती हैं? विकीपीडिया के अनुसार बहुत सारे मामलों में परिवार में किसी लड़के की गै़र-मौज़ूदगी की स्थिति में माता-पिता अपनी पुत्री को पुत्र घोषित कर उसको अपनी आमदनी का माध्यम बनाते है, और इस तरह परिवार की बाकी जायदाद भी बचा लेते हैं.

इसी संदर्भ में याद आती है अपर्णा सेन की एक बंगाली फ़िल्म ‘सती‘. उन्नीसवीं सदी की पॄष्ठभूमि में बनी इस फ़िल्म में प्रमुख नायिका उमा (शबाना आज़मी) का विवाह एक वृक्ष के साथ कर दिया जाता है. फ़िल्म का अंत तो बहुत ही मार्मिक और संकेतात्मक है.

मैं सोचता हूं कि क्या यह वही भारतभूमि है जहां सदियों से “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैस्तु न पूज्यन्तेसर्वस्तत्रफला: क्रिया:” की गूंज सुनायी देती आ रही है?

सम्बंधित कड़ी: देवदासी प्रथा पर एक शोधपत्र

July 23, 2006

बाबा काज़मी की एक रचना

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:26 pm

पिछ्ले दिनों पाकिस्तान के मशहूर शायर बाबा अहमद नदीम काज़मी का स्वर्गवास हो गया. बाबा काज़मी को गुलज़ार साहब जैसे महारथी अपना गुरु मानते थे. तो प्रस्तुत है बाबा काज़मी की एक रचना, भावों की गहरायी देखिये:

कौन कहता है

कौन कहता है कि मौत आयी तो मर जाऊंगा
मैं तो दरिया हूं, समन्दर में उतर जाऊंगा

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊंगा
घर में घिर जाऊंगा, सहरा में बिखर जाऊंगा

तेरे पहलू से जो उठूंगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख्स को पाऊंगा, जिधर जाऊंगा

अब तेरे शहर में आऊंगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊंगा

तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वरना सोचा था कि जब चाहूंगा, मर जाऊंगा

चारासाज़ों से अलग है मेरा मेयार कि मैं
ज़ख्म खाऊंगा तो कुछ और संवर जाऊंगा

अब तो खुर्शीद को डूबे हुए सदियां गुज़रीं
अब उसे ढ़ूढने मैं ता-बा-सहर जाऊंगा

ज़िन्दगी शमा की मानिंद जलाता हूं ‘नदीम’
बुझ तो जाऊंगा मगर, सुबह तो कर जाऊंगा

– बाबा अहमद नदीम क़ाज़मी

इस रचना के कुछ अंशों को स्वयं बाबा काज़मी की आवाज़ में यहां सुनिये.

[आसानी के लिये कुछ शब्दार्थ:

दरिया = जलस्रोत; सहरा = रेगिस्तान; अब्र = बादल; मानिंद = के जैसे, की तरह; पैमान = वादा;
चारासाज़ = चिकित्सक, सहानुभूति रखने वाला; मेयार = स्तर, गुणवत्ता; खुर्शीद = सूर्य; सहर = सुबह;
ता-बा-सहर = सुबह तक]

ईश्वर बाबा काज़मी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे.

July 19, 2006

गन्ने का रस

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:32 pm

सुना था कि यूरोपीय देशों में गर्मी कम पड़ती है. कल समाचार देखा कि फ्रांस में तापमान ३५ डिग्री सेल्सियस पहुंचा और लोग हस्पतालों में भर्ती होना शुरु. कोई आश्चर्य नहीं है. भारत में तो लोग गर्मी से निपटने के उपाय रखते है, लेकिन यूरोपीय देशों में कार्यालयों और घरों में प्राय: वातानुकूलन की व्यवस्था नहीं होती. हां, सर्दी से बचाव के लिये बहुत तरीके हैं इन लोगों के पास.

अब ऐसे में हमको अपने देसी गन्ने के रस की याद आये तो क्या गलत है? याद आ रही है, और सुबह से आ रही है, तो सोचा कि इसी पे चिट्ठा लिख दिया जाय.

गन्ने के रस के साथ मेरा लगाव बचपन से रहा. गांव में स्थित आवासीय विद्यालय में पढ़ता था और पास ही ईख के खेत थे. वहां हाथ से चलने वाला कोल्हू भी था. जाकर ईख तोड़ो, खुद कोल्हू चलाकर रस निकालो और १ रुपये में एक लिटर वाला लोटा भरकर ले जाओ. पास में ही एक कोने में गुड़ बनता रहता था, सो कभी कभी शौक में राव (गुड़ और गन्ने के रस के बीच की अवस्था) भी लेकर आते थे. उसमें छिली हुई मूंगफ़ली डालकर भी एक प्रयोग किया था एक बार!

फिर कालेज के दिनों में भी संयोग ऐसा बना कि गर्मियों के दिनों में पास में ही गन्ने के रस का ठेला था और दाम था मात्र ५० पैसे का एक गिलास! खास बात ये थी कि अपना गिलास खुद धोकर रखना होता था यहां. कई बार तो जब लोग शर्त लगाते थे तो साफ़ कह देते थे कि हारने पर ठेले वाले गन्ने के रस को छोड़ के कुछ भी खिला-पिला देना.

फिर मैं मुंबई आया और वहां के रस जैसा स्वाद मुझे पहले कभी नहीं मिला था. शायद इसलिये कि मुंबई के रस वाले गन्ने को अच्छे से छीलकर और उसमें नींबू मिलाकर देते थे. हमारे मुहल्ले के रस वाले ने शायद ही कभी ठीक से गन्ने को साफ़ किया हो. जब भी कभी चर्चगेट या वी.टी. जाना होता, खुद-ब-खुद अपने कदम हुतात्मा चौक स्थित गन्ने के रस वाली अपनी प्रिय स्टाल की ओर बढ़ जाते थे जिसके सामने वड़ा-पाव की लोकप्रिय दुकान थी. फिर क्या, वड़ा-पाव खाओ, गन्ने का रस पियो और मारो डकार. कई बार बड़ा वाला गिलास भी काफ़ी नहीं होता था, तो एक-एक पैग और मार लिया जाता. एक बार मित्र ने बताया “क्यों फ़ाउन्टेन वाली दुकान पे जाते हो, स्टर्लिंग सिनेमा के सामने वाले ठेले ट्राय करो. केवल २ रुपये का बड़ा गिलास है”. एक बार जब “मार्डन हिन्दू होटल”, जो कि स्टर्लिंग सिनेमा के पास दक्षिण भारतीय थाली का प्रसिद्ध स्थान है, से पेट-पूजा कर लौटे तो एक ठेले पर “२ रुपये बड़ा गिलास” वाली तख्ती पर नज़र गयी. तुरंत एक गिलास गटक गये, लेकिन बहुत गुस्सा आया. इतना बेकार रस तो कभी नहीं पिया था! इतना पानी तो मुहल्ले का दूधिया भी नहीं मिलाता. हमने इनसे हाथ जोड़ लिये और अपनी हुतात्मा चौक वाली स्टाल से गद्दारी करने पर मन ही मन क्षमा मांग ली.

यूरोप में ढूंढने से भी कहीं नसीब हो रहा आज हमें गन्ने का रस. एक सहकर्मी से पूछा तो उत्तर मिला कि गन्ना तो शक्कर बनाने के लिये होता है, उसका रस क्या पीना? मन में आया कि कह दें बंदर और अदरक वाली कहावत, फिर सोचा जाने दो. ओ स्टर्लिंग सिनेमा के पास वाले २ रुपये वाले भैया तू ही आ जा!

June 17, 2006

नकली मां

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 11:35 pm

निधि ने कुछ दिन पहले अपनी मम्मी के डायलॉग का ज़िक्र किया था. मैंने टिप्पणी लिखनी चाही तो इतनी बड़ी हो गयी कि सोचा कि इसको अपने चिट्ठे पर ही छाप दूं.

ये डायलॉग भी मां के हैं, लेकिन उस मां के जो केवल फ़िल्मों में दिखती है. वास्तविकता में इनमें से एक भी डायलॉग किसी की भी असली मां से नहीं सुना मैंने.

१. तेरे पैदा होने से पहले ही मैं मर क्यों नहीं गयी?
२. आज तेरे बाबूजी होते तो बहुत खुश होते.
३. भाईसाहब, मेरी बेटी बी.ए. पास है, घर का सारा कामकाज जानती है, लेकिन देने के लिये इस लक्ष्मी के सिवा कुछ और नहीं है मेरे पास.
४. मेरे बेटे को छोड़ दो, मैं पांव पड़ती हूं तुम्हारे.
५. मैं न कहती थी राधा की मां कि मेरा बेटा बड़ा होनहार है. देखो, पूरे इम्तिहान में फ़र्स्ट आया है.
६. जज साहब, एक दुखियारी अपने लाल की ज़िंदगी की भीख मांगती है आपसे.
७. मैंने तेरे बाबूजी को वचन दिया था कि इस राज को छिपा के रखूंगी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.
८. मैं आज कितनी खुश हूं, ये केवल एक मां का दिल ही जानता है.
९. तूने मुझसे इतना बड़ा झूठ क्यूं बोला?
१०. इस घर में बहू बन के डोली में बैठ के आयी थी, अब तो चिता के साथ ही जाऊंगी.
११. अपनी मां से छिपाता है पगले!
१२. अब तो एक बहू ले आ, सो चैन से मर सकूं
१३. तुझे इसी दिन के लिये पाल-पोस के बड़ा किया था?
१४. वचन दे मुझे कि हमेशा बहू को खुश रखेगा.
१५. ये न्याय नहीं अन्याय है.

May 28, 2006

अपनी मर्ज़ी से कहां

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 2:22 pm

एक गीत सुना था, "अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं…". दूरदर्शन के सैलाब नामक धारावहिक से था यह गीत. यह धारावाहिक कभी देखा नहीं, लेकिन गीत सुना था जगजीत सिंह की "मिराज़" में.

कल एमस्टर्डम की गलियों में घूमते हुए इस गीत के साथ साक्षात्कार भी हो गया. एक दुकान, जो "सूंघने में भारतीय महसूस हो रही थी", में जाने पर आभास हुआ कि दुकानदार, जिनकी उम्र होगी कोई ४५-५० वर्ष, हिन्दी में रेडियो सुन रहे थे. इससे पहले कि मैं अपने कान सतर्क करके अपने आभास का सत्यापन करता, उन्होने हिन्दी में पूछ ही लिया "आप लोग कहां से हैं"? उन्हें इस बात की प्रसन्नता हुयी कि हम भारतीय हैं. मैंने भी जिज्ञासापूर्वक उनसे यही सवाल किया, इस आशा के साथ कि वे भारत के ही उस हिस्से का नाम बतायें जहां से वे आये हैं. लेकिन जवाब मिला - "सूरीनाम, लेकिन हम लोग भारत से ही आकर सूरीनाम में बसे हैं". उनकी आवाज़ में एक अपनापन सा था.

कहां भारत, कहां सूरीनाम और कहां नीदरलैंड! तीनों अलग-अलग महाद्वीपों, धरती के अलग-अलग छोरों पर बसे हुये देश. उन्नीसवीं सदी में नौकरी की खातिर अपनी जमीन से अलग किये गये ये लोग बस नौकर बनकर ही रह गये! दासता और शोषण के मारे उन इंसानों के वंशज करीब १५० सालों से उनकी धरोहर संभाले हुये हैं, इतनी शुद्ध हिन्दी बोलते हैं - धन्य हैं ये लोग! मैं यह सोच ही रहा था कि भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे जलती हुयी धूपबत्ती पर नज़र भी गयी. मैंने पूछा, आप यहां एमस्टर्डम कब आये, तो उन्होंने बस यही कहा कि बहुत साल हो गये. बातचीत बस इतने में ही पूरी हो गयी, लेकिन कुछ अधूरा-अधूरा सा अभी भी कहीं था दिलो-दिमाग़ में.

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर खोजबीन की तो पाया कि सूरीनाम में एक समय डच साम्राज्यवाद हुआ करता था. एक बहुत ही दु:खद सूचना यह प्राप्त हुयी कि सन् १८८३ में डच लोगों ने एमस्टर्डम में सूरीनाम से लोगों को लाकर पिंजरे में बंदकर उनकी प्रदर्शनी लगायी थी - ठीक उसी तरह जैसे कि चिड़ियाघर में जानवर!

गये थे हमारी ही मिट्टी से सात समंदर पार अच्छी नौकरी लेने - पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार सहे, कई बार रोटी को मोहताज हुए पर भगवान कृष्ण की मिट्टी की मूरत के सामने अगरु-धूप जलाना नहीं भूले, अपनी भाषा, अपना संगीत सब याद है इन्हें. सचमुच धन्य हैं ये.

संबंधित कड़ियां: विकीपीडिया पर सूरीनाम, सूरीनाम का संगीत, सूरीनाम का इतिहास, Human Zoo

May 22, 2006

डाक्टर बुधीराम

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:10 pm

बुधिया तो दौड़ गया ६५ किलोमीटर, आम जनता ने तालियां पीट दीं और खास जनता ने दौड़ा दिया दिमाग़. बोल रहे थे, बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, उसकी जान को खतरा है! नेताजी को समझ आया और सरकार ने बुधिया के गुरूजी को मुर्गा बना दिया.

हमारे गांव में भी बहुत सारे बुधिया थे. उनमें से एक के बारहवीं क्लास में पूरे ४९.५ परसैन्ट नंबर आये. ईक्वल अपरचूनिटी के नाते बुधिया गया डाक्टरी पढ़ने. हम बोले कि बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, सबकी जान को खतरा है! नेताजी को इस बार कुछ समझ नहीं आया!

May 16, 2006

आरक्षण और गोलू-भोलू

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:54 am

एक आघात पहुंचा जब यह समाचार सुना कि मुंबई में चिकित्सकों और विद्यार्थियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. उनका कसूर था कि वे संगठित होकर अपनी आवाज़ सत्ताधारियों और कानून की किताब के पन्नों में आये दिन जोड़-तोड़ करने वालों के कानों तक, लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचाना चाहते थे. ये न तो अपराधी थे, और न ही हथियारबंद लोग कि हिंसा की आशंका होती. क्या हमारा लोकतंत्र इतना बहरा हो गया है कि मुठ्ठी भर निर्दोष लोगों के स्वर भी उसे चीख की तरह सुनायी देते हैं? क्या सत्ता के आसन पर बैठने वाले जनतंत्र की परिभाषा भूल गये हैं? यह प्रबुद्ध जनसमूह जिस मुद्दे पर अपनी आवाज़ रखना चाहता था उससे हमारे देश की भावी दिशा निर्धारित होने वाली है.

एक थी मम्मी, और उसके थे दो बेटे - भोलू और गोलू. एक बार गांव में पल्स पोलियो अभियान वाले स्वयंसेवक आये और जब उन्होंने गोलू को दवा पिलायी तो वह रोने लगा और बोला कि दवा कड़वी है, खैर दवा तो गयी पेट में, अब क्या. मम्मी ने सोचा कि भोलू आंगन में सो रहा है और ऐसी कड़वी दवा पिलाने के लिये उसको उठाना उचित नहीं.

अगले दिन पड़ोस की चाची ने मम्मी को बताया कि दवा न पिलाने से पैर खराब हो जाते हैं. मम्मी रोने लगी और तुरंत जाकर भोलू को सीने से लगा लिया. अभी तो भोलू १० महीने का भी नहीं है, और अभी से अगर उसको जमीन पर अकेला छोड़ दिया तो उसके पैरों की हड्डियां कमजोर हो जायेंगी. आगे जाकर तो और भी तक़लीफ होगी, इसीलिये मम्मी जब कभी भी बाज़ार-हाट या पड़ोस में जाती, भोलू को अपनी गोद में लेती. उसे हमेशा चाची की बात याद आ जाती थी कि दवा न पिलाओ तो पैर खराब हो जाते हैं.

एक दिन गोलू की भी इच्छा हुई और बोला, मम्मी मुझे भी गोद में लो ना. मम्मी को गुस्सा आया, बोली कि तूने तो दवा पी हुई है. भोलू तो सचमुच भोला था, उसे लगा कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से देखा नहीं जाता!

समय गुज़रता गया और एक दिन मम्मी को एहसास हुआ कि चाची की बात तो सच हो गयी! भोलू ५ साल का हो गया और अभी तक उसके पैर काम नहीं करते. चाची कहती हैं कि बस एक ही बार दवा न पिलायी उसी का असर है. गोलू-भोलू के मास्टरजी कहते हैं कि सारा समय भोलू को गोद में लेकर रखा तो ताकत कहां से आती बेचारे के पैरों में? मम्मी कहती है कि चाची ने नज़र लगा दी है भोलू के पैरों को. पता नहीं सच्चाई क्या है? अरे हां, इस कहानी की मम्मी का पूरा नाम है भारतमाता!

भोलू और गोलू अब बड़े हो गये हैं. भोलू हर बुधवार पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर मम्मी के साथ हाट में सामन लेने जाता है, और अभी भी उसको ऐसा लगता है कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से नहीं देखा जाता! उसे बार-बार याद आता है कि गोलू यह जानते हुये भी कि उसका अपना भाई अपाहिज है, हमेशा स्कूल की रेस में हिस्सा लेता था.

भोलू भाई, तुमको कब एहसास होगा कि मास्टरजी सही कहते थे?

May 8, 2006

रो मत बेटा

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:49 am

मैंने सुना है कि रामगढ़ में जब भी कोई बच्चा रोता है तब मां कहती है, "रो मत बेटा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जायगा". बहुत ही नायाब तरीका है यह बच्चे चुप करवाने का. लेकिन यहां यूरोप में रामगढ़ तो कहीं है नहीं, तो जब भी बच्चा रोता है तो माता-पिता बच्चे के मुंह में रबर की चुसनी ठूंस देते हैं. अगर बच्चा सार्वजनिक जगह पर रोये तो लोग माता-पिता और बच्चे को टेढ़ी नज़र से देखते हैं. अब भैया, बच्चों का रोना तो स्वाभाविक क्रिया है, काहे उसे रोकना. जब तक बच्चे अस्वाभाभिक रूप से अधिक न रोयें तब तक ठीक ही है. बच्चे चुप कराना भी कला है, जिसमें माहिर होने के लिये आपको बच्चे पर अधिक ध्यान और समय देना होता है. समय तो तब मिले ना जब बाकी कामों से फ़ुर्सत मिले.

आज ट्रेन में ऐसी ही एक दुर्घटना घट गयी. एक बच्चा रोने लगा, मां ने चुसनी ठुंसाये बिना बच्चे को प्यार से चुप करवाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चा माना नहीं. पास बैठे एक सज्जन से बच्चे का दर्द देखा नहीं गया और उन्होंने अपने श्रीमुख से भले-बुरे शब्द निकाल दिये. भले शब्द थे कि बच्चे चुप करना तो बहुत आसान काम है, ये भी नहीं कर सकतीं, और भैया, बुरे शब्दों का भावार्थ न ही करूं तो अच्छा है.

मेरे विचार से चुसनी ठूंस देना भी हिंसा का ही एक रूप है, और छोटे बच्चे को स्वयं को व्यक्त करने के लिये रोने का सहारा न लें तो और करें भी क्या? बच्चे रोकर क्या कहना चाहते हैं, इसको नज़र-अंदाज़ कर देना माता-पिता की लापरवाही है.

May 1, 2006

परिणीता (१९१३-१९५३-२००५)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:32 pm

शरत बाबू के लिखे गये उपन्यास पर आधारित फ़िल्म परिणीता (२००५) देखी थी पिछले साल, फिर मन किया चलो उपन्यास भी पढ़ लिया जाय. सौभाग्य से हिन्दी पुस्तकों की दुकान में मिल भी गया, और १०० से भी कम पृष्ठ थे उसमें, इसीलिये पढ़ने की हिम्मत भी हो गयी. खैर जैसी कि उम्मीद थी, फ़िल्म में उपन्यास को हू-ब-हू प्रस्तुत नहीं किया गया था. मुझे शक़ था कि शरत बाबू ने उपन्यास के अन्त में शेखर से दीवार नहीं तुड़वाई होगी, और शक़ सही निकला.

ऊपर वाले की कृपा रही कि पिछले दिनों अशोक कुमार और मीना कुमारी वाली १९५३ में बनी परिणीता भी हाथ लग गयी, और कल हमने देख भी ली. दोनों ही कलाकारों ने अपना हिस्सा बखूबी निभाया है, और पूरी ही फ़िल्म बहुत सीधी सच्ची मालूम होती है. गाने भी अच्छे हैं, खास तौर पर "राधे रानी". एक बात तो माननी होगी कि नयी वाली परिणीता के लिये प्रदीप सरकार ने समय के हिसाब से उपन्यास में कुछ फेरबदल अवश्य किया है, परन्तु सादगी बनाये रखी है.

इन तीनों (उपन्यास, पुरानी परिणीता और नयी परिणीता) में कौन सा सबसे अच्छा लगा, मेरे लिये यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तीनों ही अपने देश-काल और विधा के हिसाब से अपनी-अपनी जगह उत्कृष्ट हैं. और हां, मैंने पढ़ा था कि इसी उपन्यास को लेकर एक और फ़िल्म बनी थी, संकोच नाम से. किसी ने वह देखी है क्या?

April 23, 2006

पूरब-पश्चिम

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:24 pm

पिछले दिनों सामूहिक भोज में चर्चा का विषय था, विश्व की दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा कौन सी है. पास बैठे हुए विद्वान अमेरिकी मित्र फ़रमा रहे थे कि ये फ्रांसीसी भाषा ही होगी. मैंने अपनी आदत के अनुसार रंग में भंग डाला और पूछा, भैया पहले सबसे लोकप्रिय भाषा का नाम तो बताओ. उन अमेरिकी मित्र के इर्द-गिर्द मौजूद अंग्रेज़ी प्रेमी गुर्रा के बोले, ये भी नहीं जानता! मैं घबराया, और बची-खुची हिम्मत जुटा के बोला नहीं मैं ये नहीं जानता, क्योंकि आप जो कहना चाहते हैं वह सही नहीं है. एक अंग्रेज़ी प्रेमी की टेढ़ी निगाहें बोलीं, तू कौन होता है इस अटल सत्य को स्वीकार ना करने वाला?

पूरी चर्चा में चीनी (मंदारिन) और हिन्दी का कोई नामोनिशान नहीं था, और इस मुद्दे पर मुझको सबके साथ "पंगा" लेना पड़ा. अगर आप मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या की दृष्टि से देखें, तो चीनी के बाद हिन्दी का स्थान आता है. और अगर समझने वालों की संख्या की दृष्टि से देखा जाय तो भी अंग्रेजी प्रथम नहीं है, और फ्रांसीसी का तो नाम दूर दूर तक नहीं दिखता. मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह की सूचियों में उच्च स्थान पर आना विशेष गर्व का विषय है, बल्कि इंगित मात्र करना चाहता हूं कि पूर्व के बारे में पश्चिम के लोग कितने अनभिज्ञ और उदासीन हैं. उनके अनुसार भारत की हर गली में दो-चार घर सपेरों के होते हैं, बुजुर्ग लोग बडी़ सी दाढी़ और जटा रखते हैं, इत्यादि.

खैर हमको क्या मतलब अगर कोई हमारे बारे में अनभिज्ञ रहे, लेकिन हम स्वयं को ठीक से जानें यही पर्याप्त है. हिन्दी के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में बच्चों वाले पृष्ठ पर इंटरनेट सुरक्षा के संबंध में मुझे मिला यह वाक्य: "नेट यूज़ करते समय अपने पेरेन्ट्स और टीचर्स की हेल्प लें". अगर अगली पीढ़ी कहेगी कि "प्रयोग, माता-पिता, गुरुजन, सहायता, ये सारे वर्ड्स आउटडेटेड हैं", तो जिम्मेदार आखिर कौन होगा?

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