पिटारा भानुमती का

अगस्त 27, 2011

शॉर्ट-कट उर्फ़ भ्रष्टाचार

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 7:30 अपराह्न

ट्रैफ़िक नियम तोड़ते हुए पकड़े जाओ तो १०० का नोट थमाओ, किसे पड़ी है ट्रैफ़िक पुलिस ऑफ़िस जाकर ३०० रुपये भरने की? तू भी खुश, मैं भी खुश। ट्रेन में बिना टिकट और बिना किच-किच यात्रा करनी हो तो टी.टी. को ‘पटाओ’। तू भी खुश, मैं भी खुश। मुन्ने के बर्थ-डे पर घर के बाहर तम्बू लगाकर बिजली चोरी करते हुए न पकड़े जाने के लिये बिजली विभाग के सुपरवाइज़र को ‘प्रसाद’ चढ़ाओ। इस बार भी तू भी खुश, मैं भी खुश। बिजली कौन से सुपरवाइज़र के घर की है! क्या यह देश हमारा, हम सबका घर नहीं है?

हमें आदत हो चुकी है शॉर्ट-कट की। इस शॉर्ट-कट में‌ हमें कोई भ्रष्टाचार भी नज़र नहीं आता। भ्रष्टाचार तो तब होता है जब हमारी जेब ‘अफोर्ड’ नहीं कर पाती! तब लगता है, काश, कोई अन्ना हज़ारे सशक्त कानून बनवा गया होता तो भ्रष्टाचारियों को अंदर करा देते।

पर भ्रष्टाचार के पेड़ को रोज़ाना ५०-१०० रुपये के नोट से किसने सींचा? हमारी शॉर्ट-कट की आदत ने हमारे अच्छे-भले की समझ को ही कट-शॉर्ट कर दिया। क्या ये दोष भी हम सरकार के मत्थे मढ़ दें? नेता, अफ़सर, नौकरशाह, सब हमें भ्रष्टाचार से सराबोर नज़र आते हैं पर अपने गरेबाँ में झाँकने का साहस हमारे में नहीं। यदि हर हिन्दुस्तानी यह साहस दिखा सके तो भ्रष्टाचार के मुँह पर इससे अधिक करारा तमाचा और कोई नहीं हो सकता, कोई कानून भी नहीं। “मैं रिश्वत नहीं दूँगा, भले ही कुछ दिन और परेशानी झेलनी पड़े”। क्या यह संकल्प सचमुच इतना कठिन है? यदि हाँ, तो मैं कहूँगा कि अन्ना जी बेवजह ही परेशान हो रहे हैं असंवेदनशील, निराशावादी लोगों की उस भीड़ के प्रति जो भ्रष्ट तंत्र को अपनी नियति मान चुकी है।

मई 28, 2010

दीदी के धूल भरे पाँव

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:46 अपराह्न

बहुत दिन बाद लौटा हूँ; इस चिट्ठे पर, और इस शहर में। मुंबई को अपने जीवन के छ: वर्ष दिये और बदले में मिला जीवन में कुछ भी कर गुज़र जाने का विश्वास, एक हौसला।

गये बरसों में बहुत कुछ बदल गया। कुछ ऊँची इमारतें उगने लगीं, ठीक उसी जगह जहाँ किसी की छत धँसी थी। ये किसी उजड़े हुए, किसी गुज़रे हुए काफ़िले का ग़ुबार है या कंक्रीट में से झरती हुई धूल?

और कहाँ गई चर्चगेट स्टेशन के पास की वो जगह जहाँ बेघर हुई किताबें किसी की राह तकती थीं, अपना नया आशियां ढूँढती थीं? अभी किसी कोने में धूल की चादर ओढ़े सिसक रही होंगी शायद!

धूल उड़ती हुई, धूल जमती हुई… इतनी ही धूल थी इस शहर में तो क्या बुरे थे दूर गाँव में दीदी के धूल भरे पाँव, कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव?

— (धर्मवीर भारती जी ने ‘दीदी के धूल भरे पाँव’ १९५९ में अपने मुंबई आगमन पर लिखी थी।)

जुलाई 17, 2008

रेल की खिड़की से (चित्र – २)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 7:13 अपराह्न

सुबह का समय; और इस बार यात्रा दिल्ली और आगरा के बीच। ताज एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी कुर्सी यान में खिड़की वाली कुर्सी पर बैठा हूँ मैं। संदेह होता है कहीं अनारक्षित डिब्बा तो नहीं है ये! मुझे मुंबई लोकल के अनुभवों की याद आ रही‌ है। एक युवा जोड़े का आगमन होता है, उनकी आरक्षित कुर्सी घेरी जा चुकी है; इस देश में कुर्सी की ताकत बहुत है! पत्नी जी कुर्सीखोरों से कुर्सी को मुक्त कराने का प्रयास करती हैं। “तो हम कहाँ बैठें बहनजी”? इतने विचारपूर्ण तर्क से पत्नी जी तिलमिला जाती हैं और गाँधीवादी शैली में कहतीं हैं, यहीं बैठो! कुर्सीखोर खटमल की तरह अब भी कुर्सी से चिपके हुये हैं!

गाड़ी अब तुगलकाबाद के पास के नाले और कचरे के ढेर को पार कर रही है। आई.आई.एम. वालों को कचरा मैनेजमेंट में भी एक कोर्स रखना चाहिये! कचरे से ईंधन बन जाता है, बहुत सुन रखा है। अगर हमारी सरकार को भी सुनाई दे जाता तो न्यूक्लियर डील की नौबत न आती और सरकार को ये दिन नहीं देखना पड़ता। गाड़ी कचरों के ऐसे कई ढेरों को पार करती चली आ रही‌ है और मैं निठल्ला चिंतन में व्यस्त हूँ। कचरों के इस धुंध में एक किरण आती है और फ़रीदाबाद का पी.वी.आर. सिनेमा दिखाई देता है। कचरे और पी.वी.आर. में बस आँखों के लेंस की फ़ोकल लेंथ को एडजस्ट करने भर की दूरी है! “यूनिटी इन डायवर्सिटी” का इससे अच्छा उदाहरण कहाँ मिलेगा।

तभी टिकट चेकर साहब का आगमन होता है। मेरे हृदय में बेटिकट और अनारक्षित यात्रियों के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है, “चलो अच्छा है, भीड़ कम होगी”। अगले ही क्षण मुझ में स्वयं के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है क्योंकि टी.सी. साहब बहुत दयालु हैं और सबका काम पक्का करते जा रहे हैं! भला हो इस देश का।

अब नाश्ते का समय हो चला है और पेट में चूहे दौड़ने लगे हैं। मैं एक बिस्किट, चिप्स और ‘ठंडा बिसलरी’ खरीद लेता हूँ। तभी अगली कुर्सी वाले सज्जन बीड़ी सुलगा लेते हैं, मेरे प्रतिरोध करने पर बंद तो कर देते हैं, पर अपनी आँखों से मुझे जता देते हैं कि मेरे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया जा रहा है।

अब मेरे चिप्स खत्म हो चुके हैं। चिप्स का पैकेट कितना ही बड़ा क्यों न हो, हमेशा छोटा ही लगता है। हिन्दी में वो कहावत है न, “नो वन कैन ईट जस्ट वन्स”! पैकेट खाली है और अपनी नियति जानता है, पटरी मिलाप! पर मैं एक सभ्य नागरिक हूँ, ऐसा नहीं होने दूँगा, किसी कूड़ेदान में ही डालूँगा। यही सोचकर उसे अपने बस्ते की आगे वाली जेब में रख लेता हूँ।

अब आगरा का राजा की मण्डी स्टेशन आ चुका है, मैं एक कूड़ेदान की तलाश में हूँ, मेरी कोशिश असफल रहती है!

दो दिन बाद मैं वापस दिल्ली जाने के लिये प्लेटफ़ार्म पर खड़ा गाड़ी की‌ प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सहसा बस्ते की आगे वाली जेब में हाथ जाता है। चिप्स के पैकेट का स्पर्श होते ही मैं कूड़ेदान की खोज में पूरा प्लेटफ़ार्म खोज मारता हूँ। एक बार फिर मेरी कोशिश असफल रहती है!

“अगर मुझे पटरी पर ही फेंक दिया होता तो कम से कम खुली हवा में साँस तो ले रहा होता, ये बस्ते में तो नहीं सड़ना पड़ता”! मैं चिप्स के पैकेट के समक्ष लज्जित हो जाता हूँ!

जुलाई 14, 2008

रेल की खिड़की से (चित्र – १)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:57 अपराह्न

सुबह का समय; दिल्ली से चंडीगढ़ तक की छोटी सी रेल यात्रा – कुछ घण्टे भर की दूरी। मुझे खिड़की वाली जगह पसंद है, वहीं बैठा हूँ। बाहर झाँकता हूँ तो झाँकने का मन, सच कहें कि साहस नहीं होता क्योंकि पटरी के पास झुग्गियों में बसे लोगों की मजबूरी अन्दर झाँकने लगती है। लालकिले से ब्रितानी झण्डा उतरे ६० साल हो चुके हैं, विश्वास नहीं होता! समझ नहीं आता दोष किसके मत्थे मढ़ूँ – व्यवस्था के, इन लोगों की किस्मत के, लालची जन प्रतिनिधियों के, खुद इनके या अपने? एकाएक मन में विचार उठते हैं कुछ करने के! शायद शिक्षा की ज्योति इनके अंधेरे दूर कर सके?

विचार लोक में विचरण करते-करते मैं रेल को हरे भरे खेतों के बीच में पाता हूँ। रेल हरियाणा से होकर गुज़र रही‌ है। पकने को आतुर गेंहूँ की बालें हाथ हिलाकर अभिवादन करती हैं, मेरा मन भी उन्हें झुककर प्रणाम करता है “शस्य श्यामला मातरम्”। राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियों का स्मरण हो उठता है-

“तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं?
मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं?
किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं?”

साठ के दशक में आई हरित क्रांति के फलस्वरूप हरियाणा और पंजाब का लहलहाता हुआ यह इलाका आम जीवन में शिक्षा और तकनीकी के महत्व की कहानी स्वयं कह रहा है। मुझे याद आती है भारतीय उपग्रहों के फसल बीमा में उपयोग की अनूठी तकनीक की; मुझे भारतीय होने पर गर्व होने लगता है। सहसा मेरी नज़र पटरियों पर पड़े चिप्स के खाली पैकैटों, प्लास्टिक की थैलियों और सिगरेट के बक्से पर जाती है और मैं बाहर झाँकना बंद कर देता हूँ!

क्या मेरे आँखें फेर लेने से सच्चाई बदल जायेगी?

अप्रैल 12, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – ३)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:39 अपराह्न

बारिश बहुत हो रही थी, मज़ा भी आ रहा था पर अभी बाहर निकलने की हिम्मत न थी। मैं अपने कमरे से ही नज़ारे देखता रहा।

कमरे से नज़ारा

अगले दिन की क्या योजना होगी? विचारविमर्श हुआ और निर्धारित किया गया कि एब्बी जलप्रपात और ब्यालाकुप्पे में स्थित बुद्ध विहार देखा जायेगा। शरत् ने हमारे लिये एक गाड़ी का प्रबंध भी करके रखा था। अगली सुबह नाश्ता करके निकला जायेगा, ऐसा विचार था। पर हममें से कुछ उत्साही लोग सुबह तड़के ही एक बार और आसपास का इलाका छान मार आये। वे ऐसी चोटी पर चढ़कर आये जहाँ से सब कुछ साफ़साफ़ देखा जा सकता था। वे लोग वापस आये और हम सब जीप में सवार हुये। समय था चेंगप्पा परिवार को विदा कहने का। हमने वादा किया कि अगली बार आपके यहाँ समय लेकर आयेंगे। हमारी गाड़ी अपने पहले गंतव्य स्थल एब्बी जलप्रपात की ओर रवाना हुई।

कुछ सामान गाड़ी के ऊपर रखा था, बारिश का डर भी था। सो हमने अपने ड्राइवर अली भाई से निवेदन किया कि वे प्लास्टिक की थैलियों की व्यवस्था करके हमारा ऊपर रखा सामान ढक दें। अली भाई का घर रास्ते में ही था। अपने बेटे को आवाज़ देकर वे अंदर खाने चले गये। उनका बेटा कुछ थैलियाँ लेकर निकला और हमारे सामान को ढक कर चला गया। कुछ समय बाद हम एब्बी प्रपात पहुँचे। हल्काफुल्का खाना खाया और प्रपात को निहारा। पानी बहुत अधिक नहीं था, पर वहाँ जाकर शान्ति महसूस हुई। थकान भी कम लग रही थी।

एब्बी जल-प्रपात

अब हम निकल पडे ब्यालाकुप्पे बुद्ध विहार की ओर। ब्यालाकुप्पे मैसूर के पश्चिम में स्थित कुशानगर नामक शहर के पास का इलाका है जिसमें १९६० के दशक में भारत आये करीब दस हज़ार तिब्बती लोग शरण ले रहे हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल हैं नामड्रोलिंग विहार और उससे लगा हुआ मंदिर। विहार और उसके आस-पास की सफ़ाई देखकर भ्रम हुआ कि कहीं हम भारत के बाहर तो नहीं आ गये!

बुद्ध मंदिर

इतना भव्य मंदिर तिब्बती लोगों की अपनी मातृभूमि से हज़ारों कोस दूर! भारत की यही रंगबिरंगी विविधता मुझे अक्सर अचंभित कर देती है। मंदिर के अंदर गया तो बच्चन जी की `बुद्ध और नाचघर’ का स्मरण हो आया। भला बुद्ध और मूर्ति! कहीं मैं एक विरोधाभास के बीच तो नहीं खड़ा?इसी बौद्धिक मंथन के बीच मेरी नज़र राजस्थान से आये एक परिवार पर पड़ी। चौखट को प्रणाम करके बुद्ध की मूर्ति के सामने इस परिवार के सदस्य उसी श्रद्धा से नतमस्तक होकर खड़े थे जैसे वे अपने किसी इष्ट देव का ध्यान कर रहे हों। जैसे भगवान हमारे, वैसे उनके“, यह भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट था। मूर्तियाँ एक अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करती हैं जिस रूप में सौंदर्य के दर्शन हों, उसी में मूर्ति ढाल लो और दे दो अपने देव का सांकेतिक स्वरूप। पहले बौद्धिक मंथन का समाधान हुआ तो मैं दूसरे में उलझ गया। “विश्व के सभी लोग उसी समरसता के साथ क्यों नहीं रह सकते जिसके दर्शन मुझे अभी इस राजस्थानी परिवार में हुये जैसे भगवान हमारे, वैसे उनके

बुद्ध मंदिर

मंदिर और उसके आस-पास घूमकर बहुत अच्छा लगा।

बुद्ध मंदिर

शाम के समय मुख्य मंदिर के सामने के दो कक्षों में जलते हुए दिये झरोखों से हमें देख रहे थे, मानो कुछ सीख दे रहे हों। वापस चलने का समय आया और हमने इन दियों से विदा ली।

अब वापस विराजपेट जाकर बंगलौर की बस पकड़ने का उद्देश्य था। रास्ते में चायपानी हुआ और बस के निर्धारित समय से करीब घण्टा भर पहले विराजपेट पहुँच गये। सुबह ४:३० बजे तक हम बंगलौर वापस थे। यात्रा यादगार रही। एक बार फिर जाने की इच्छा अभी भी है।

अप्रैल 1, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – २)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:03 अपराह्न

बारिश का मज़ा लेते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थ। झाड़ियाँ-घने पेड़, सबको चीरते हुए हम सूखे तालाब के पास आ पहुँचे। यह जंगल के बीच में एक खुला स्थान था और कुछ ऊँचाई पर भी था, सो आस-पास का नज़ारा बखूबी निहारा जा सकता था। अब बारी थी मानचित्र खोलकर आगे का रास्ता समझने की। कुछ प्रबुद्ध साथियों ने इस क्लिष्ट कार्य में अपनी अकल लगाई।

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कुछ साथी इधर-उधर ताँक-झाँक कर रहे थे और मैं अपने कैमरे मैं सबको कैद कर रहा था।

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प्रबुद्ध साथियों को रास्ता समझने में सफलता प्राप्त हुई। आगे का रास्ता दुर्गम और संकरा था। सभी एक-दूसरे को पाँव संभालकर रखने की हिदायत दे रहे थे, खुद बेपरवाह चल रहे थे। बारिश की वजह से मिट्टी भी पोली हो चुकी थी। मुझे आभास हुआ जैसे कोई काँटा मेरे बांये पैर में चुभ रहा है। “यह सब तो होता ही रहता है, और भला वह शूरवीर ही क्या जो शूल चुभने पर ढेर हो जाये”, सो अभियान जारी रहा। “मुझे लगता है आधे से ज्यादा रास्ता तय हो गया है, पहुँचने ही वाले होंगे”, “अबे ध्यान से सुन, पानी की आवाज़ आ रही है, झरना पास ही है”, “बंगलौर वापस जाकर ’रेस’ देखेंगे” – ऐसे विचारपूर्ण संवादों को चीरती हुई एक ध्वनि सुनाई दी, “सब लोग रुक जाओ, सोमा को लीच (जौंक) ने काट लिया है!” मेरे होश गुम हो गए. जौंक काटने और सर्पदंश में अंतर करने की सुबुद्धि मुझ में थी ही नहीं। अब विचार आया कि मेरे बांये पैर में जो काँटा चुभ रहा है, कहीं वह भी जौंक तो नहीं! हिम्मत करके बांये पैर का अवलोकन किया, मेरा शक सही था! जौंक खून चूसकर मोटी हो रही थी, और मेरी हालत पतली! एक मित्र ने तुरंत मिट्टी से सना पत्थर उठाया और जौंक को परलोक पहुँचा दिया। शायद जौंक को शरीर से अलग करने का यह तरीका सही नहीं था, पर उस समय जो सूझा सो किया (शेर भी सामने आता तो उसे भी मिट्टी का ढेला उठाकर मारने का प्रयास किया जाता)। फिर देखा कि मेरे जूते के छेद में से होकर दो जौंक मेरे चरण-स्पर्श करने को उत्कंठित हैं। अब तक हिम्मत आ चुकी थी, और इन दोनों जौंकों ही हत्या का पाप मैंने अपने सिर लिया! बाकी साथियों की हालत भी ऐसी ही थी। हम जौंकों के (सुनियोजित?) आक्रमण का शिकार हो चुके थे! “अब क्या करें? वापस चला जाये क्या?” विचार-विमर्श होने लगा। मेरा कायर मन कह रहा था कि, चलो भाग चलो, पर होठों ने मन का साथ नहीं दिया और कमबख्त बोल उठे “कुछ दूर ही तो है, इतना आ गये हैं तो पूरा करके ही जाते है।” बाकी सब के होठों की भी यही राय थी। जल-प्रपात कुछ ५०० मीटर भर दूर था। जौंक चिपकती रहीं, शूरवीर बढ़ते रहे। जल-प्रपात के आधार तक हम पहुंचे, पर जौंकों के कारण सम्पूर्ण मनोयोग से आनन्द न ले सके। फिर भी बहुत अच्छा लग रहा था। अब बारी थी वापसी की। रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था। किसी तरह सूखे तालाब तक वापस आये। यहां जौंक नहीं थीं। सबने एक दूसरे की जौंक छुड़ायीं। रक्तरंजित पाँव हमारी वीरता की कहानी कह रहे थे। सहसा किसी के मुख से निकला एक समीकरण – “लीच + कीचड़ = लीचड़”; हमारे सुमुख से तत्काल उद्धृत हुआ “व्हाट ए बैड जौंक!”

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भोजन के समय से कुछ पहले हम वापस “हनी वैली एस्टेट्” आ गये। तैयार होकर भोजन करने गये और शरत् को अपना यात्रा वृतांत सुनाया। शरत् ने बताया कि जंगल के इस भाग को “लीच पैलेस” कहते हैं। हमें आभास हुआ कि अभियान पर निकलने से पहले हमें शरत् से सविस्तार विचार-विमर्श करना चाहिये था। भोजन बहुत अनूठा था; इसकी विशेषता थी कि अगर कोई विदेशी इस भोजन को खाये तो उसे बहुत मसालेदार न लगे और कोई देसी खाये तो उसे फीका न लगे। भोजन के उपरान्त कुछ ने आराम किया और कुछ निकल गये आस-पास के क्षेत्र में तस्वीरें खींचने। (क्रमश:)

मार्च 30, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – १)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 4:05 अपराह्न

कर्नाटक के दक्षिण पश्चिम में बसा कुर्ग अपनी प्राकृतिक सुन्दरता का अनूठा उदाहरण है। पश्चिमी घाट के पूर्व में बसा यह स्थान जितना खूबसूरत है उतने ही यहाँ के लोग। इस बार सोचा कि यहीं होकर आया जाये। मित्रों की टोली इकट्ठी हुयी और सब निकल पड़े बंगलौर से कुर्ग की हसीन वादियों की तरफ़। और सबसे अच्छी बात यह कि हमारे ठहरने की व्यवस्था किसी होटल में न होकर चारों ओर जंगल से घिरे चेंगप्पा परिवार के “हनी वैली ऐस्टेट्” में थी। कभी चेंगप्पा परिवार का व्यवसाय मधुमक्खी पालन हुआ करता था परंतु थाइलैण्ड से आये हुये एक वायरस के कारण उन्हें यह कार्य सीमित करना पडा। फिर उन्होंने निर्णय लिया कि वे हम जैसे सैलानियों का स्वागत अपने घर में करेंगे। अतिथि-गृह तैयार हुये उनके ही घर के पास और हम जैसे कंजूस लोगों को बहुत कम खर्चे में ऐसे मनोरम स्थल पर जाकर स्वयं को धन्य करने का मौका मिला।

२२ मार्च की सुबह हम कर्नाटक राज्य परिवहन की बस से विराजपेट पहुँचे। वहाँ से कब्बीनाकाड के लिये जीप पहले ही आरक्षित करा चुके थे सो निकल पड़े जीप में। जीप रुकी तो आस पास कुछ भी नज़र नहीं आया। “भैया, कहाँ छोड़ के जा रहे हो यार”? इतने में ही श्रीमान चेंगप्पा मुस्कुराते हुये हमारे सामने उपस्थित हुये। उन्होंने बताया कि अब वे स्वयं हमें पहाडी पर स्थित अपने “हनी वैली एस्टेट्” में लेकर जायेंगे। रास्ता दुर्गम था और बेहद सुन्दर। (वैसे भी लालची मनुष्य जहाँ जहाँ आसानी से पहुँच जाता है वह स्थान असुन्दर हो जाता है, सो दुर्गम रास्ते खूबसूरत होंगे ऐसी अपेक्षा की ही जा सकती है।)

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ऐसी खूबसूरती बटोरते हुये हम कुछ देर बाद अपने पड़ाव पर आ पहुँचे। क्या हम रहेंगे यहाँ! हुर्रे मुझे विश्वास हो चला कि अवश्य पिछले जन्म के सुकर्मों का फल होगा यह!

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सबने तैयार होकर श्रीमती चेंगप्पा और उनके सहयोगियों के हाथ का बना लज़ीज़ नाश्ता किया। फिर शरत् (चेंगप्पा परिवार का पुत्र,जो होटल प्रबंधन में परास्नातक भी है और सभी सैलानियों का खयाल रखता है) को पकड़ा और पूछा कि भाई बताओ अब क्या करें। शरत् ने तुरंत एक छोटी सी पुस्तक हमारे हाथ में थमा दी। उस पुस्तक में आस पास के इलाके का मानचित्र था। चलो, जंगल छान मारते हैं बहुत मज़ा आयेगा। सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि जल-प्रपात के एकदम नीचे जाते हैं। मानचित्र तो साथ है ही। बारिश हो रही थी तो लगा कि मज़ा दुगना हो जायेगा। कुछ ने हाथ में छतरी ली, कुछ ने बरसाती ओढी और सब निकल पडे पा पा पैंयां छप छप छैयां करते हुये… (क्रमश:)

मार्च 6, 2008

बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 6:25 अपराह्न

“बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र, क्या मानी”

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आज जब ये खबरें एक साथ देखीं तो साहिर की कविता ताज महल की ये पंक्तियाँ स्वत: याद आ गईं. जब मैं मुम्बई में रहता था तो अक्सर कफ़ परेड स्थित अम्बानी भाई के बंगले के सामने से गुजरना होता. सड़क के एक ओर रईस लोगो की तिजोरी और दूसरी तरफ़ मच्छिमार नगर में मछली पकड़कर पेट भरने वालों की झुग्गी बस्ती, कितना बड़ा विरोधाभास था सड़क भर के फासले पर. यही विरोधाभास दुनियाँ का बहुत बड़ा सच है!

विश्व में गरीबी से बड़ी समस्या है पैसे का वितरण! कुछ लोग चिकन बर्गर खाकर मोटे हो रहे हैं और दूसरी ओर लोग चूहे मारकर खाने को विवश हैं, अथवा स्वयं काल का ग्रास बन रहे हैं. पैसे के वितरण का आधार क्या है आख़िर? बुद्धि, शक्ति अथवा दूसरे का शोषण कर पाने की कला? या फिर केवल हाथ की लकीरें? क्या विश्व में ऐसी व्यवस्था कायम नहीं हो सकती जिसकी नींव मुहम्मद यूनुस साहब कुछ दशक पहले ही रख चुके हैं? जिनकी तिजोरियाँ भर चुकी हैं क्या उनका यह दायित्व नहीं कि वे पैसे की गिनती छोड़कर ऐसी व्यवस्था कायम करने आगे आयें?

वैसे वारेन बफेट साहब ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउन्डेशन में बहुत आर्थिक योगदान दिया है, आशा है उनका यह पैसा बी.बी.सी. समाचार में उनसे अंगुली भर के फासले पर बैठे जरुरतमन्द लोगों तक पहुँच सकेगा. वैसे मेरी समझ से बफेट साहब और यूनुस साहब के गरीबों के प्रति योगदान में मूल अंतर यह भी है कि यूनुस साहब का योगदान न सिर्फ आज गरीबों का पेट भरता है, बल्कि उन्हें कल के लिये सक्षम भी बनाता है, उन्हें यह सिखाता है कि वे “चैरिटी” के पात्र मात्र नहीं हैं.

अक्टूबर 29, 2007

आइये पल्ला झाड़ें

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 6:25 अपराह्न

आज बी.बी.सी. की अंग्रेज़ी वेब-साइट पर देखा कि कपड़ों की एक नामी-गिरामी ब्राण्ड पर बाल मजदूरी करवाने का आरोप लगा है. वैसे सस्ते श्रम की उपलब्धता के कारण अच्छी से अच्छी कम्पनियों के कपड़े “मेड इन इण्डिया” या “मेड इन बंगलादेश” होते हैं, यह सर्वविदित है. कम्पनियाँ चाहती हैं कि सस्ती लागत में उनका काम चल जाये. वैसे इस सस्ती लागत का प्रभाव कीमतों पर ज़रा भी नहीं पड़ता! हमें कपड़े नहीं, उस पर छपे ठप्पे के नाम पर पैसे देने की आदत हो चली है, स्टेटस जो मैंटेन करना है!

मजेदार बात तो यह है कि उनके विज्ञापन का खर्चा भी हमारी जेब से जाता है. कम्पनी की आय का कितना हिस्सा श्रमिकों के हिस्से जाता होगा, पता नहीं. पर इस कम्पनी को कपड़े उपलब्ध कराने वाली एक फ़ैक्टरी लिये काम करने वाले १० साल के एक बच्चे को चार महीने से उसका वेतन नहीं मिला था! अब कहा जा सकता है कि इस मामले में कम्पनी को क्यों घसीटा जाये, उसका तो ऐसी घटना से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, गलती है तो फ़ैक्टरी की. कम्पनी तो खुद फ़ैक्टरी से माल खरीद रही है. हम भी परवाह क्यों करें, हमारी जिम्मेदारी तो ठप्पे की कीमत चुकाने के साथ ही खत्म हो जाती है. हम इस ठप्पे से आने वाले अपने सोशल स्टेटस के लिये १००० रुपये अधिक खर्च कर सकते हैं, पर घर की छत से दिखने वाली झुग्गी बस्ती में रहने वाले १० साल के रमेश की पढ़ाई के लिये २०० रुपये खर्च करने का विचार तक हमारे मन में नहीं आता. रमेश के माँ-बाप के पास भी पैसा नहीं है, इसीलिये वह पास की फ़ैक्टरी में शाम को कपड़ा काटने जाता है, धीरे-धीरे काम सीख जायेगा. पर जाने दीजिये, हमें क्या मतलब. हमारी ब्राण्डेड जींस का कपड़ा रमेश काटे या सुरेश, हमें क्या फ़र्क पड़ता है पर हम अपनी जेब फ़लाँ-फ़लाँ कम्पनी से ही कटवायेंगे यह स्टेटस वाली बात है.

बात पता नहीं कहाँ से कहाँ आ गई, पर मुझे यह समझ नहीं आया कि बाल-श्रम के लिये जिम्मेदार कौन हुआ? कम्पनी, फ़ैक्टरी या बच्चे के माँ-बाप? हम तो जिम्मेदार नहीं हैं, यह पक्की बात है!

जुलाई 21, 2007

कुछ सपनों के मर जाने से

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 3:13 अपराह्न

कल राह चलते एक ऐसे व्यक्ति से भेंट हुई जिनके दोनों हाथ नहीं थे. उम्र होगी कोई ३५ वर्ष. पास आकर अंग्रेज़ी में बोले “प्लीज़ हेल्प, आई एम हैन्डीकैप्ड विद हैन्ड्स”. उनका आशय था कि मैं उन्हें कुछ रुपये दे दूँ. मैं सोचने लगा क्या परिस्थितियाँ सचमुच एक अच्छे-भले आदमी को इतना बेबस बना देती हैं कि वह हाथ फैलाने पर मजबूर हो जाये?

एक घटना याद आती है, जो अमेरिका के न्यायाधीश विलियम डगलस के साथ  हमारे ही देश में घटित हुई (उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की अंग्रेज़ी की इंटर की पाठ्य पुस्तक में इस घटना का वर्णन है). बात उन दिनों की है जब देश नया-नया आज़ाद हुआ था. विभाजन की त्रासदी से जूझ रहे कई परिवार दोनों ओर से सरहद पार कर अपनों से दूर अनजान हवाओं में सांस लेने पहुंच रहे थे, सिर्फ़ इस विश्वास के साथ कि वहाँ उनकी धार्मिक मान्यतायें अधिक सुरक्षित रह सकेंगी. डगलस महोदय उस समय दिल्ली से बरेली तक की रेलयात्रा कर रहे थे. नये देश की नब्ज़ टटोलने वे स्टेशनों पर उतरकर आम लोगों से  बात करते थे. रास्ते में कोई छोटा सा स्टेशन आया, डगलस उतरे और इतने में ही सरहद की दूसरी ओर से अपने परिवार के साथ आयी आठ-नौ साल की बच्ची उनके पास गुलदस्तों से भरी एक टोकरी लेकर आयी. उसने डगलस महोदय से कुछ गुलदस्ते खरीदने का आग्रह किया. बच्ची की स्थिति देखकर उन्हें तरस आया और उन्होंने पूरी टोकरी की कीमत पूछी. बच्ची ने खुशी-खुशी पूरा हिसाब लगा दिया. डगलस बच्ची को उतनी कीमत देकर बोले कि वे इतने सारे गुलदस्ते अपने साथ ले जाने में सक्षम नहीं हैं अत: वह बच्ची उनकी ओर से ये सारे गुलदस्ते उपहार स्वरूप रखे. बच्ची ने उनकी आँखों में झाँका और तुरंत यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया! डगलस भौंचक्के रह गये. जैसा कि उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा, उस बच्ची में उन्हें “भारत की सजीव आत्मा के दर्शन हुये”. विपरीत परिस्थितियों ने उस बच्ची को तोड़ा नहीं, बल्कि भविष्य में आने वाली चुनौतियों से जूझने की क्षमता प्रदान की. धन्य रहे होंगे वे माता-पिता जिनकी छत्र-छाया में बच्ची में ऐसे संस्कार आरोपित हुये.

मुझे कुछ ऐसा ही एक और अनुभव तब हुआ जब मैं एक सुपर-मार्केट में घूम रहा था. हाथ से बनाई हुयी कुछ पेंटिंग्स से सजे हुये कुछ बधाई-पत्रों ने मुझे सहज आकर्षित किया और मैंने कुछ बधाई-पत्र खरीद भी लिये. घर आकर इन बधाई-पत्रों को अलट-पलट कर देखा तो पता चला कि ये पेंटिंग्स हाथ से नहीं बनीं थीं क्योकि इन्हें बनाने वाले कलाकारों के हाथ तो थे ही नही! इन्हें बनाने वाली कम्पनी का नाम था “द माउथ एण्ड फ़ुट पेंटिंग्स आर्टिस्ट्स“. जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं!

हम सबके जीवन में चुनौतियां आती ही हैं. कुछ बिखर जाते हैं, तो कुछ निखर जाते हैं. फ़र्क है सिर्फ़ जीवन के प्रति दृष्टिकोण का. नीरज की पंक्तियाँ “कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है” सचमुच कितनी सच्ची हैं.  बँटवारे के समय की वो बच्ची जिन्होंने डगलस महोदय और हम सबको जीवन की इतनी बड़ी सीख दी, आज दुनियाँ में हों, न हों, पर उनकी सोच जरूर जिन्दा है. यही सोच हमें बीते हुये कल की छाया आज पर न डालकर अपने आज की रोशनी से आने वाले कल को रोशन करने की प्रेरणा देती रहेगी.

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