पिटारा भानुमती का

अप्रैल 23, 2006

पूरब-पश्चिम

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:24 अपराह्न

पिछले दिनों सामूहिक भोज में चर्चा का विषय था, विश्व की दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा कौन सी है. पास बैठे हुए विद्वान अमेरिकी मित्र फ़रमा रहे थे कि ये फ्रांसीसी भाषा ही होगी. मैंने अपनी आदत के अनुसार रंग में भंग डाला और पूछा, भैया पहले सबसे लोकप्रिय भाषा का नाम तो बताओ. उन अमेरिकी मित्र के इर्द-गिर्द मौजूद अंग्रेज़ी प्रेमी गुर्रा के बोले, ये भी नहीं जानता! मैं घबराया, और बची-खुची हिम्मत जुटा के बोला नहीं मैं ये नहीं जानता, क्योंकि आप जो कहना चाहते हैं वह सही नहीं है. एक अंग्रेज़ी प्रेमी की टेढ़ी निगाहें बोलीं, तू कौन होता है इस अटल सत्य को स्वीकार ना करने वाला?

पूरी चर्चा में चीनी (मंदारिन) और हिन्दी का कोई नामोनिशान नहीं था, और इस मुद्दे पर मुझको सबके साथ "पंगा" लेना पड़ा. अगर आप मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या की दृष्टि से देखें, तो चीनी के बाद हिन्दी का स्थान आता है. और अगर समझने वालों की संख्या की दृष्टि से देखा जाय तो भी अंग्रेजी प्रथम नहीं है, और फ्रांसीसी का तो नाम दूर दूर तक नहीं दिखता. मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह की सूचियों में उच्च स्थान पर आना विशेष गर्व का विषय है, बल्कि इंगित मात्र करना चाहता हूं कि पूर्व के बारे में पश्चिम के लोग कितने अनभिज्ञ और उदासीन हैं. उनके अनुसार भारत की हर गली में दो-चार घर सपेरों के होते हैं, बुजुर्ग लोग बडी़ सी दाढी़ और जटा रखते हैं, इत्यादि.

खैर हमको क्या मतलब अगर कोई हमारे बारे में अनभिज्ञ रहे, लेकिन हम स्वयं को ठीक से जानें यही पर्याप्त है. हिन्दी के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में बच्चों वाले पृष्ठ पर इंटरनेट सुरक्षा के संबंध में मुझे मिला यह वाक्य: "नेट यूज़ करते समय अपने पेरेन्ट्स और टीचर्स की हेल्प लें". अगर अगली पीढ़ी कहेगी कि "प्रयोग, माता-पिता, गुरुजन, सहायता, ये सारे वर्ड्स आउटडेटेड हैं", तो जिम्मेदार आखिर कौन होगा?

6 टिप्पणियाँ »

  1. चीनी (मंदारिन) का स्‍थान पहला है और हिन्‍दी अपनी सहयोगी भारतीय भाषाओं के साथ तीसरे नंबर पर है इतना कह सकता हूँ।

    टिप्पणी द्वारा Readers-cafe — अप्रैल 24, 2006 @ 2:48 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. सही कहते हो मित्र,
    आखिर हमें ही जिमेदारियां निभानी हैं।

    टिप्पणी द्वारा राम चन्द्र मिश्र — अप्रैल 24, 2006 @ 8:08 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  3. एक बात और,
    समय मिले तो About वाला पन्ना भी सही कर लीजिये।

    टिप्पणी द्वारा राम चन्द्र मिश्र — अप्रैल 24, 2006 @ 8:10 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  4. विकीपीडिया के अनुसार मंदारिन के बाद हिन्दी का स्थान आता है, देखिये.

    टिप्पणी द्वारा khulepanne — अप्रैल 26, 2006 @ 11:51 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  5. कुछ बात समझ में नहीं आयी। आपको इस बात की चुभन है कि आप गुमनाम हैं या नहीं? बात से तो ऐसा लगा कि चुभन है… पर फिर आप कहते हैं कि मुझे क्या – वे अनभिज्ञ रहते हैं तो रहें, मुझे तो पता है कि मैं क्या तोप हूं! वाह वाह वाह! अगर आप तोप हैं तो जरा गोले दागिए और और अपनी उपस्थिती दर्ज करवाइए। आपकी गुमनामी का एक ही कारण हैं – अभिमान की कमी।

    टिप्पणी द्वारा विराट — अप्रैल 28, 2006 @ 8:18 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  6. बंधु विराट, संभवत: आपने इस प्रविष्टि को ठीक से नहीं पढ़ा. मैंने किसी के तोप होने की बात कही ही नहीं, आपने स्वयं कुछ अर्थ निकाल लिया. और दूसरा ये कि आत्म प्रदर्शन करना और आत्म अभिमानी होना, दोनों में अंतर है.

    टिप्पणी द्वारा अमित — अप्रैल 28, 2006 @ 9:54 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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