पिटारा भानुमती का

मई 28, 2006

अपनी मर्ज़ी से कहां

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 2:22 अपराह्न

एक गीत सुना था, "अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं…". दूरदर्शन के सैलाब नामक धारावहिक से था यह गीत. यह धारावाहिक कभी देखा नहीं, लेकिन गीत सुना था जगजीत सिंह की "मिराज़" में.

कल एमस्टर्डम की गलियों में घूमते हुए इस गीत के साथ साक्षात्कार भी हो गया. एक दुकान, जो "सूंघने में भारतीय महसूस हो रही थी", में जाने पर आभास हुआ कि दुकानदार, जिनकी उम्र होगी कोई ४५-५० वर्ष, हिन्दी में रेडियो सुन रहे थे. इससे पहले कि मैं अपने कान सतर्क करके अपने आभास का सत्यापन करता, उन्होने हिन्दी में पूछ ही लिया "आप लोग कहां से हैं"? उन्हें इस बात की प्रसन्नता हुयी कि हम भारतीय हैं. मैंने भी जिज्ञासापूर्वक उनसे यही सवाल किया, इस आशा के साथ कि वे भारत के ही उस हिस्से का नाम बतायें जहां से वे आये हैं. लेकिन जवाब मिला – "सूरीनाम, लेकिन हम लोग भारत से ही आकर सूरीनाम में बसे हैं". उनकी आवाज़ में एक अपनापन सा था.

कहां भारत, कहां सूरीनाम और कहां नीदरलैंड! तीनों अलग-अलग महाद्वीपों, धरती के अलग-अलग छोरों पर बसे हुये देश. उन्नीसवीं सदी में नौकरी की खातिर अपनी जमीन से अलग किये गये ये लोग बस नौकर बनकर ही रह गये! दासता और शोषण के मारे उन इंसानों के वंशज करीब १५० सालों से उनकी धरोहर संभाले हुये हैं, इतनी शुद्ध हिन्दी बोलते हैं – धन्य हैं ये लोग! मैं यह सोच ही रहा था कि भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे जलती हुयी धूपबत्ती पर नज़र भी गयी. मैंने पूछा, आप यहां एमस्टर्डम कब आये, तो उन्होंने बस यही कहा कि बहुत साल हो गये. बातचीत बस इतने में ही पूरी हो गयी, लेकिन कुछ अधूरा-अधूरा सा अभी भी कहीं था दिलो-दिमाग़ में.

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर खोजबीन की तो पाया कि सूरीनाम में एक समय डच साम्राज्यवाद हुआ करता था. एक बहुत ही दु:खद सूचना यह प्राप्त हुयी कि सन् १८८३ में डच लोगों ने एमस्टर्डम में सूरीनाम से लोगों को लाकर पिंजरे में बंदकर उनकी प्रदर्शनी लगायी थी – ठीक उसी तरह जैसे कि चिड़ियाघर में जानवर!

गये थे हमारी ही मिट्टी से सात समंदर पार अच्छी नौकरी लेने – पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार सहे, कई बार रोटी को मोहताज हुए पर भगवान कृष्ण की मिट्टी की मूरत के सामने अगरु-धूप जलाना नहीं भूले, अपनी भाषा, अपना संगीत सब याद है इन्हें. सचमुच धन्य हैं ये.

संबंधित कड़ियां: विकीपीडिया पर सूरीनाम, सूरीनाम का संगीत, सूरीनाम का इतिहास, Human Zoo

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मई 22, 2006

डाक्टर बुधीराम

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:10 अपराह्न

बुधिया तो दौड़ गया ६५ किलोमीटर, आम जनता ने तालियां पीट दीं और खास जनता ने दौड़ा दिया दिमाग़. बोल रहे थे, बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, उसकी जान को खतरा है! नेताजी को समझ आया और सरकार ने बुधिया के गुरूजी को मुर्गा बना दिया.

हमारे गांव में भी बहुत सारे बुधिया थे. उनमें से एक के बारहवीं क्लास में पूरे ४९.५ परसैन्ट नंबर आये. ईक्वल अपरचूनिटी के नाते बुधिया गया डाक्टरी पढ़ने. हम बोले कि बच्चा अभी इस योग्य नहीं है कि उसको ऐसे रिस्की काम में लगाया जाय, सबकी जान को खतरा है! नेताजी को इस बार कुछ समझ नहीं आया!

मई 16, 2006

आरक्षण और गोलू-भोलू

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:54 पूर्वाह्न

एक आघात पहुंचा जब यह समाचार सुना कि मुंबई में चिकित्सकों और विद्यार्थियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. उनका कसूर था कि वे संगठित होकर अपनी आवाज़ सत्ताधारियों और कानून की किताब के पन्नों में आये दिन जोड़-तोड़ करने वालों के कानों तक, लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचाना चाहते थे. ये न तो अपराधी थे, और न ही हथियारबंद लोग कि हिंसा की आशंका होती. क्या हमारा लोकतंत्र इतना बहरा हो गया है कि मुठ्ठी भर निर्दोष लोगों के स्वर भी उसे चीख की तरह सुनायी देते हैं? क्या सत्ता के आसन पर बैठने वाले जनतंत्र की परिभाषा भूल गये हैं? यह प्रबुद्ध जनसमूह जिस मुद्दे पर अपनी आवाज़ रखना चाहता था उससे हमारे देश की भावी दिशा निर्धारित होने वाली है.

एक थी मम्मी, और उसके थे दो बेटे – भोलू और गोलू. एक बार गांव में पल्स पोलियो अभियान वाले स्वयंसेवक आये और जब उन्होंने गोलू को दवा पिलायी तो वह रोने लगा और बोला कि दवा कड़वी है, खैर दवा तो गयी पेट में, अब क्या. मम्मी ने सोचा कि भोलू आंगन में सो रहा है और ऐसी कड़वी दवा पिलाने के लिये उसको उठाना उचित नहीं.

अगले दिन पड़ोस की चाची ने मम्मी को बताया कि दवा न पिलाने से पैर खराब हो जाते हैं. मम्मी रोने लगी और तुरंत जाकर भोलू को सीने से लगा लिया. अभी तो भोलू १० महीने का भी नहीं है, और अभी से अगर उसको जमीन पर अकेला छोड़ दिया तो उसके पैरों की हड्डियां कमजोर हो जायेंगी. आगे जाकर तो और भी तक़लीफ होगी, इसीलिये मम्मी जब कभी भी बाज़ार-हाट या पड़ोस में जाती, भोलू को अपनी गोद में लेती. उसे हमेशा चाची की बात याद आ जाती थी कि दवा न पिलाओ तो पैर खराब हो जाते हैं.

एक दिन गोलू की भी इच्छा हुई और बोला, मम्मी मुझे भी गोद में लो ना. मम्मी को गुस्सा आया, बोली कि तूने तो दवा पी हुई है. भोलू तो सचमुच भोला था, उसे लगा कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से देखा नहीं जाता!

समय गुज़रता गया और एक दिन मम्मी को एहसास हुआ कि चाची की बात तो सच हो गयी! भोलू ५ साल का हो गया और अभी तक उसके पैर काम नहीं करते. चाची कहती हैं कि बस एक ही बार दवा न पिलायी उसी का असर है. गोलू-भोलू के मास्टरजी कहते हैं कि सारा समय भोलू को गोद में लेकर रखा तो ताकत कहां से आती बेचारे के पैरों में? मम्मी कहती है कि चाची ने नज़र लगा दी है भोलू के पैरों को. पता नहीं सच्चाई क्या है? अरे हां, इस कहानी की मम्मी का पूरा नाम है भारतमाता!

भोलू और गोलू अब बड़े हो गये हैं. भोलू हर बुधवार पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर मम्मी के साथ हाट में सामन लेने जाता है, और अभी भी उसको ऐसा लगता है कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से नहीं देखा जाता! उसे बार-बार याद आता है कि गोलू यह जानते हुये भी कि उसका अपना भाई अपाहिज है, हमेशा स्कूल की रेस में हिस्सा लेता था.

भोलू भाई, तुमको कब एहसास होगा कि मास्टरजी सही कहते थे?

मई 8, 2006

रो मत बेटा

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:49 पूर्वाह्न

मैंने सुना है कि रामगढ़ में जब भी कोई बच्चा रोता है तब मां कहती है, "रो मत बेटा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जायगा". बहुत ही नायाब तरीका है यह बच्चे चुप करवाने का. लेकिन यहां यूरोप में रामगढ़ तो कहीं है नहीं, तो जब भी बच्चा रोता है तो माता-पिता बच्चे के मुंह में रबर की चुसनी ठूंस देते हैं. अगर बच्चा सार्वजनिक जगह पर रोये तो लोग माता-पिता और बच्चे को टेढ़ी नज़र से देखते हैं. अब भैया, बच्चों का रोना तो स्वाभाविक क्रिया है, काहे उसे रोकना. जब तक बच्चे अस्वाभाभिक रूप से अधिक न रोयें तब तक ठीक ही है. बच्चे चुप कराना भी कला है, जिसमें माहिर होने के लिये आपको बच्चे पर अधिक ध्यान और समय देना होता है. समय तो तब मिले ना जब बाकी कामों से फ़ुर्सत मिले.

आज ट्रेन में ऐसी ही एक दुर्घटना घट गयी. एक बच्चा रोने लगा, मां ने चुसनी ठुंसाये बिना बच्चे को प्यार से चुप करवाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चा माना नहीं. पास बैठे एक सज्जन से बच्चे का दर्द देखा नहीं गया और उन्होंने अपने श्रीमुख से भले-बुरे शब्द निकाल दिये. भले शब्द थे कि बच्चे चुप करना तो बहुत आसान काम है, ये भी नहीं कर सकतीं, और भैया, बुरे शब्दों का भावार्थ न ही करूं तो अच्छा है.

मेरे विचार से चुसनी ठूंस देना भी हिंसा का ही एक रूप है, और छोटे बच्चे को स्वयं को व्यक्त करने के लिये रोने का सहारा न लें तो और करें भी क्या? बच्चे रोकर क्या कहना चाहते हैं, इसको नज़र-अंदाज़ कर देना माता-पिता की लापरवाही है.

मई 1, 2006

परिणीता (१९१३-१९५३-२००५)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:32 अपराह्न

शरत बाबू के लिखे गये उपन्यास पर आधारित फ़िल्म परिणीता (२००५) देखी थी पिछले साल, फिर मन किया चलो उपन्यास भी पढ़ लिया जाय. सौभाग्य से हिन्दी पुस्तकों की दुकान में मिल भी गया, और १०० से भी कम पृष्ठ थे उसमें, इसीलिये पढ़ने की हिम्मत भी हो गयी. खैर जैसी कि उम्मीद थी, फ़िल्म में उपन्यास को हू-ब-हू प्रस्तुत नहीं किया गया था. मुझे शक़ था कि शरत बाबू ने उपन्यास के अन्त में शेखर से दीवार नहीं तुड़वाई होगी, और शक़ सही निकला.

ऊपर वाले की कृपा रही कि पिछले दिनों अशोक कुमार और मीना कुमारी वाली १९५३ में बनी परिणीता भी हाथ लग गयी, और कल हमने देख भी ली. दोनों ही कलाकारों ने अपना हिस्सा बखूबी निभाया है, और पूरी ही फ़िल्म बहुत सीधी सच्ची मालूम होती है. गाने भी अच्छे हैं, खास तौर पर "राधे रानी". एक बात तो माननी होगी कि नयी वाली परिणीता के लिये प्रदीप सरकार ने समय के हिसाब से उपन्यास में कुछ फेरबदल अवश्य किया है, परन्तु सादगी बनाये रखी है.

इन तीनों (उपन्यास, पुरानी परिणीता और नयी परिणीता) में कौन सा सबसे अच्छा लगा, मेरे लिये यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तीनों ही अपने देश-काल और विधा के हिसाब से अपनी-अपनी जगह उत्कृष्ट हैं. और हां, मैंने पढ़ा था कि इसी उपन्यास को लेकर एक और फ़िल्म बनी थी, संकोच नाम से. किसी ने वह देखी है क्या?

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