पिटारा भानुमती का

मई 1, 2006

परिणीता (१९१३-१९५३-२००५)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:32 अपराह्न

शरत बाबू के लिखे गये उपन्यास पर आधारित फ़िल्म परिणीता (२००५) देखी थी पिछले साल, फिर मन किया चलो उपन्यास भी पढ़ लिया जाय. सौभाग्य से हिन्दी पुस्तकों की दुकान में मिल भी गया, और १०० से भी कम पृष्ठ थे उसमें, इसीलिये पढ़ने की हिम्मत भी हो गयी. खैर जैसी कि उम्मीद थी, फ़िल्म में उपन्यास को हू-ब-हू प्रस्तुत नहीं किया गया था. मुझे शक़ था कि शरत बाबू ने उपन्यास के अन्त में शेखर से दीवार नहीं तुड़वाई होगी, और शक़ सही निकला.

ऊपर वाले की कृपा रही कि पिछले दिनों अशोक कुमार और मीना कुमारी वाली १९५३ में बनी परिणीता भी हाथ लग गयी, और कल हमने देख भी ली. दोनों ही कलाकारों ने अपना हिस्सा बखूबी निभाया है, और पूरी ही फ़िल्म बहुत सीधी सच्ची मालूम होती है. गाने भी अच्छे हैं, खास तौर पर "राधे रानी". एक बात तो माननी होगी कि नयी वाली परिणीता के लिये प्रदीप सरकार ने समय के हिसाब से उपन्यास में कुछ फेरबदल अवश्य किया है, परन्तु सादगी बनाये रखी है.

इन तीनों (उपन्यास, पुरानी परिणीता और नयी परिणीता) में कौन सा सबसे अच्छा लगा, मेरे लिये यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तीनों ही अपने देश-काल और विधा के हिसाब से अपनी-अपनी जगह उत्कृष्ट हैं. और हां, मैंने पढ़ा था कि इसी उपन्यास को लेकर एक और फ़िल्म बनी थी, संकोच नाम से. किसी ने वह देखी है क्या?

3 टिप्पणियाँ »

  1. परीणिता उपन्यास मैंने बाँग्ला में पढ़ी है और शायद ५० बार। अशोक कुमार और मीना कुमारी वाली सबसे ज़्यादा आरीजिनल के करीब है। सुलक्षणा पंडित के साथ जीतेन्द्र वाली भी बुरी नहीं थी।(आरीजिनल के करीब है) और आज की परीणिता जैसा आपने कहा, समय के हिसाब से ठीक है पर दीवार तोडना आदि बहुत ज़्यादा नाटकीय है। कहानी में काफ़ी फ़ेरबदल किया गया है। संयोग से मैंने तीनों देखी हैं।

    टिप्पणी द्वारा मानसी — मई 2, 2006 @ 5:31 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. Swagat hai aapka Hindi Blog……Chiththakar Jagat mein:).
    Parineeta maine padhi to nahin haan movie juroor dekhi thi. Climax ko agar hata dein to picture to behtareen banayi thi sarkar saheb ne. Aur uske geeton ki to baat hi kya. Ratiyaan Andhiyari..to qamal ka get tha.

    टिप्पणी द्वारा Manish — मई 7, 2006 @ 7:45 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  3. मानसी जी: वाह! आपने तो परिणीता के सारे स्वरूप देख लिये. मूल उपन्यास तो मैं नहीं पढ़ सकता, बंग्ला जो नहीं आती, बस अनुवाद पढ़ के ही काम चला लिया है.

    मनीष जी: हां, बिल्कुल, नयी वाली फ़िल्म का अंत बेहद नाटकीय है. और अंधियारी रतियां तो गाया भी बहुत कमाल का है, चित्रा और स्वानन्द किरकिरे ने बेहद खूबसूरती के साथ भी गाया है.

    टिप्पणी द्वारा khulepanne — मई 8, 2006 @ 9:51 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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