पिटारा भानुमती का

मई 16, 2006

आरक्षण और गोलू-भोलू

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:54 पूर्वाह्न

एक आघात पहुंचा जब यह समाचार सुना कि मुंबई में चिकित्सकों और विद्यार्थियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. उनका कसूर था कि वे संगठित होकर अपनी आवाज़ सत्ताधारियों और कानून की किताब के पन्नों में आये दिन जोड़-तोड़ करने वालों के कानों तक, लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचाना चाहते थे. ये न तो अपराधी थे, और न ही हथियारबंद लोग कि हिंसा की आशंका होती. क्या हमारा लोकतंत्र इतना बहरा हो गया है कि मुठ्ठी भर निर्दोष लोगों के स्वर भी उसे चीख की तरह सुनायी देते हैं? क्या सत्ता के आसन पर बैठने वाले जनतंत्र की परिभाषा भूल गये हैं? यह प्रबुद्ध जनसमूह जिस मुद्दे पर अपनी आवाज़ रखना चाहता था उससे हमारे देश की भावी दिशा निर्धारित होने वाली है.

एक थी मम्मी, और उसके थे दो बेटे – भोलू और गोलू. एक बार गांव में पल्स पोलियो अभियान वाले स्वयंसेवक आये और जब उन्होंने गोलू को दवा पिलायी तो वह रोने लगा और बोला कि दवा कड़वी है, खैर दवा तो गयी पेट में, अब क्या. मम्मी ने सोचा कि भोलू आंगन में सो रहा है और ऐसी कड़वी दवा पिलाने के लिये उसको उठाना उचित नहीं.

अगले दिन पड़ोस की चाची ने मम्मी को बताया कि दवा न पिलाने से पैर खराब हो जाते हैं. मम्मी रोने लगी और तुरंत जाकर भोलू को सीने से लगा लिया. अभी तो भोलू १० महीने का भी नहीं है, और अभी से अगर उसको जमीन पर अकेला छोड़ दिया तो उसके पैरों की हड्डियां कमजोर हो जायेंगी. आगे जाकर तो और भी तक़लीफ होगी, इसीलिये मम्मी जब कभी भी बाज़ार-हाट या पड़ोस में जाती, भोलू को अपनी गोद में लेती. उसे हमेशा चाची की बात याद आ जाती थी कि दवा न पिलाओ तो पैर खराब हो जाते हैं.

एक दिन गोलू की भी इच्छा हुई और बोला, मम्मी मुझे भी गोद में लो ना. मम्मी को गुस्सा आया, बोली कि तूने तो दवा पी हुई है. भोलू तो सचमुच भोला था, उसे लगा कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से देखा नहीं जाता!

समय गुज़रता गया और एक दिन मम्मी को एहसास हुआ कि चाची की बात तो सच हो गयी! भोलू ५ साल का हो गया और अभी तक उसके पैर काम नहीं करते. चाची कहती हैं कि बस एक ही बार दवा न पिलायी उसी का असर है. गोलू-भोलू के मास्टरजी कहते हैं कि सारा समय भोलू को गोद में लेकर रखा तो ताकत कहां से आती बेचारे के पैरों में? मम्मी कहती है कि चाची ने नज़र लगा दी है भोलू के पैरों को. पता नहीं सच्चाई क्या है? अरे हां, इस कहानी की मम्मी का पूरा नाम है भारतमाता!

भोलू और गोलू अब बड़े हो गये हैं. भोलू हर बुधवार पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर मम्मी के साथ हाट में सामन लेने जाता है, और अभी भी उसको ऐसा लगता है कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से नहीं देखा जाता! उसे बार-बार याद आता है कि गोलू यह जानते हुये भी कि उसका अपना भाई अपाहिज है, हमेशा स्कूल की रेस में हिस्सा लेता था.

भोलू भाई, तुमको कब एहसास होगा कि मास्टरजी सही कहते थे?

9 टिप्पणियाँ »

  1. सही है

    टिप्पणी द्वारा आशीष — मई 16, 2006 @ 6:07 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. कहानी काफी शिक्षाप्रद और मर्म पर चोट करने वाली है। जब तक आरक्षण के द्वारा वर्ग विशेष को सुविधाएँ दी जाती रहेंगी, तब तक वह उन्नति नहीं कर पाएगा।

    टिप्पणी द्वारा Pratik Pandey — मई 16, 2006 @ 9:41 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  3. वोट बटोरने वाले अगर यह सोचते या पढ़ पाते तो कितना अच्छा होता ।

    टिप्पणी द्वारा ratna — मई 16, 2006 @ 10:23 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  4. बिल्कुल सही है। अगर कोई वाकई प्रतिभाशाली है तो उसे आरक्षण की बैसाखी की क्या आवश्यक्ता है? आरक्षण अगर इतना ही आवश्यक है तो उसका आधार आर्थिक स्थिति होना चाहिए ना कि जाति।

    टिप्पणी द्वारा Shalini Narang — मई 16, 2006 @ 12:01 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  5. काश हमारे नेतागण “आरक्षित” ना होते तो यह पढ पाते और कुछ तो समझते.

    एक आसान सी कहानी के माध्यम से आपने अपनी बात बड़ी ही सहजता से पेश कर दी है.

    पढ कर अच्छा लगा.

    टिप्पणी द्वारा vijay wadnere — मई 16, 2006 @ 1:17 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  6. कथासार: संरक्षित नहीं सक्षम बनाईये.
    GOOD

    टिप्पणी द्वारा Sanjay Bengani — मई 16, 2006 @ 1:26 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  7. संजय भाई की बात से पूर्णतः सहमत हूँ.

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — मई 16, 2006 @ 3:48 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  8. आप सब को टिप्पणियों के लिये धन्यवाद.

    आशा है वोट बैंक की राजनीति के विरोध में जल्द ही देश में माहौल खड़ा होगा और ये बात भोलू भी समझ पायेगा. संजय भाई, आपने मेरी रामकथा चार शब्दों में ही व्यक्त कर दी, आपका विशेष धन्यवाद.

    टिप्पणी द्वारा khulepanne — मई 17, 2006 @ 1:56 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  9. bahut dino baad tumhare blog par gayi -jane par tumhare naye blog ke bare mein pata chala-
    achha hai

    टिप्पणी द्वारा sumedha — मई 21, 2006 @ 8:04 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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