पिटारा भानुमती का

जून 17, 2006

नकली मां

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 11:35 अपराह्न

निधि ने कुछ दिन पहले अपनी मम्मी के डायलॉग का ज़िक्र किया था. मैंने टिप्पणी लिखनी चाही तो इतनी बड़ी हो गयी कि सोचा कि इसको अपने चिट्ठे पर ही छाप दूं.

ये डायलॉग भी मां के हैं, लेकिन उस मां के जो केवल फ़िल्मों में दिखती है. वास्तविकता में इनमें से एक भी डायलॉग किसी की भी असली मां से नहीं सुना मैंने.

१. तेरे पैदा होने से पहले ही मैं मर क्यों नहीं गयी?
२. आज तेरे बाबूजी होते तो बहुत खुश होते.
३. भाईसाहब, मेरी बेटी बी.ए. पास है, घर का सारा कामकाज जानती है, लेकिन देने के लिये इस लक्ष्मी के सिवा कुछ और नहीं है मेरे पास.
४. मेरे बेटे को छोड़ दो, मैं पांव पड़ती हूं तुम्हारे.
५. मैं न कहती थी राधा की मां कि मेरा बेटा बड़ा होनहार है. देखो, पूरे इम्तिहान में फ़र्स्ट आया है.
६. जज साहब, एक दुखियारी अपने लाल की ज़िंदगी की भीख मांगती है आपसे.
७. मैंने तेरे बाबूजी को वचन दिया था कि इस राज को छिपा के रखूंगी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.
८. मैं आज कितनी खुश हूं, ये केवल एक मां का दिल ही जानता है.
९. तूने मुझसे इतना बड़ा झूठ क्यूं बोला?
१०. इस घर में बहू बन के डोली में बैठ के आयी थी, अब तो चिता के साथ ही जाऊंगी.
११. अपनी मां से छिपाता है पगले!
१२. अब तो एक बहू ले आ, सो चैन से मर सकूं
१३. तुझे इसी दिन के लिये पाल-पोस के बड़ा किया था?
१४. वचन दे मुझे कि हमेशा बहू को खुश रखेगा.
१५. ये न्याय नहीं अन्याय है.

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