पिटारा भानुमती का

अगस्त 8, 2006

जनतंत्र के हित में

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 1:08 पूर्वाह्न

समाचारों का भी फ़ैशन होता है. अभी जो फ़ैशन में नहीं है, वह आउटडेटेड है. और भैया आउटडेटेड समाचारों को मीडिया वाले क्यों छापें? आरक्षण का मुद्दा ठण्डे बस्ते में चला गया और किसी को याद ही नहीं कि दो महीने पहले दिल्ली के मेडिकल छात्रों का विशाल जत्था, सिर्फ़ इसलिये कि हमारे नीति-निर्धारकों के कान पर कहीं तो जूं रेंगे, भूख हड़ताल पर था. पर रात गई, सो बात गई.

अभी शनिवार की ही बात है, आई.आई.टी. कानपुर के छात्रों ने सोचा कि कुछ और नहीं तो सोनिया गांधी के सामने ही गुहार लगायी जाय. वैसे भी सोनिया जी ८ अगस्त को आ ही रहीं हैं कानपुर में एक रैली के लिये. तो योजना बनी कि उनकी रैली के समय शान्तिपूर्ण तरीके से आरक्षण के विरोध में मानव श्रृंखला बनायी जाय. खबर कांग्रेस वालों तक पहुंची तो उन्होंने फ़ील्डिंग लगायी. नतीजा हुआ कि १५ छात्र आई.आई.टी. गेट पर गिरफ़्तार कर लिये गये. क्या हमारे सशक्त लोकतंत्र को इन निहत्थे छात्रों से इतना खतरा है कि उनको हथकड़ियां पहनायी जायें?

फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की एक नज़्म की ये पंक्तियां याद आती हैं, जो उन्होंने लिखीं तो पाकिस्तान के लिये थीं, पर हमारे ऊपर भी लागू होती हैं:

निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन, कि जहां
चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्मो-जां बचा के चले

सोनिया जी, सुन रहीं हैं क्या?

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अगस्त 6, 2006

हिरोशिमा की पीड़ा

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 2:53 अपराह्न

आज हिरोशिमा नरसंहार को ६१ वर्ष पूरे हो गये हैं. मानवता के नाम पर कलंक था वह दिन. उस दिन स्कूल में पढ़ने वाला शिगेरु अपना लंच न ले सका और तीन वर्षीय मासूम शिनिची को उसके रिक्शे के साथ ही उसके पिता ने दफ़्न किया. क्या महान उपलब्धि रही उन मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की! क्या बुद्धि इतनी बलवती हो सकती है भावनाओं पर?

वाजपेयी जी की कविता ‘हिरोशिमा की पीड़ा’ याद आती है:

किसी रात को
मेरी नींद आचानक उचट जाती है
आंख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूं कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोये होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिये सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!
यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!

– अटल बिहारी वाजपेयी (साभार: मेरी इक्यावन कवितायें)

एक संयुक्त बयान में बम गिराने वाले विमानचालक दल के तीन जीवित सदस्यों ने कहा है कि उन्हें अपने किये का कोई पछ्तावा नहीं. खैर वे तो मोहरे थे, लेकिन इंसान भी तो थे.

ईश्वर ने दुनियां की रचना की, और इसका अंत होगा हमारे हाथों. कैसी विडम्बना है यह?

सम्बंधित कड़ियां: बी.बी.सी. हिन्दी पर हिरोशिमा त्रासदी के ६० वर्ष, Hiroshima Peace Site

अगस्त 3, 2006

बाबुल की “दुआयें”

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 1:13 अपराह्न

“बाबुल की दुआयें लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले…”. लेकिन क्या बीतती होगी उस स्त्री पर जिसका पति कोई इंसान नहीं बल्कि कोई धार्मिक पुस्तक अथवा वॄक्ष है! यह कोरी कल्पना मात्र नहीं, यथार्थ है. दिल दहला देने वाले इस यथार्थ से कल इंटरनेट पर भेंट हुई, आप भी वीडियो देखिये.

क्या किसी के लिये अपनी ही पुत्री का जीवन इतना बेमानी है? हम भारतीय भी इसमें पीछे नहीं. देवदासी प्रथा को कौन नहीं जानता. भारत के कई कोनों में आज भी देवदासियां मौज़ूद हैं. माता-पिता ही अपनी पुत्रियों का जीवन किसी देवता तो समर्पित कर देते हैं. कैसा समर्पण है यह? अपना बोझ हल्का करने को समर्पण नाम दे दिया जाता है. आखिर कितनी स्त्रियां स्वेच्छा से देवदासियां बनती हैं? विकीपीडिया के अनुसार बहुत सारे मामलों में परिवार में किसी लड़के की गै़र-मौज़ूदगी की स्थिति में माता-पिता अपनी पुत्री को पुत्र घोषित कर उसको अपनी आमदनी का माध्यम बनाते है, और इस तरह परिवार की बाकी जायदाद भी बचा लेते हैं.

इसी संदर्भ में याद आती है अपर्णा सेन की एक बंगाली फ़िल्म ‘सती‘. उन्नीसवीं सदी की पॄष्ठभूमि में बनी इस फ़िल्म में प्रमुख नायिका उमा (शबाना आज़मी) का विवाह एक वृक्ष के साथ कर दिया जाता है. फ़िल्म का अंत तो बहुत ही मार्मिक और संकेतात्मक है.

मैं सोचता हूं कि क्या यह वही भारतभूमि है जहां सदियों से “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैस्तु न पूज्यन्तेसर्वस्तत्रफला: क्रिया:” की गूंज सुनायी देती आ रही है?

सम्बंधित कड़ी: देवदासी प्रथा पर एक शोधपत्र

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