पिटारा भानुमती का

जनवरी 26, 2007

वो मंज़िल अभी नहीं आई

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:22 अपराह्न

गणतंत्र दिवस के अवसर पर फ़ैज़ की एक कविता जो उन्होंने अगस्त १९४७ में लिखी थी. यह कविता उस समय की आम मनो:स्थिति का रेखांकन बखूबी करती है, पर देखिये आज ६० वर्ष बाद भी दोनों देशों की परिस्थितियों के संदर्भ में उतनी ही प्रासंगिक है. क्यों? मेरे विचार से यदि गये साठ सालों में यह कविता अपनी प्रासंगिकता खो देती तो बेहतर होता!

सुबहे आज़ादी

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में
चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े
पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे-सहर की लगन

बहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन
सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गाम

बदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर
निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारे हिज़्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निग़ारे-सबा किधर को गयी
अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई
निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

– फ़ैज़ अहमद `फ़ैज़’

जनवरी 21, 2007

कब सुधरेंगे हम?

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:35 पूर्वाह्न

मेरे पड़ोसी रामलाल की भैंस चोरी हो गयी है. मुझे पक्का पता है कि पास के गाँव रईसपुर के पूर्व प्रधान झाड़ सिंह के बेटे झाड़ सिंह जूनियर ने ही चुरायी है. पुलिस है कि हाथ पे हाथ धरे बैठी है. अब मैं क्या करूँ? सोच रहा हूँ कि इस घटना के विरोध में अपने खेत में आग लगा लूँ. कैसा आयडिया है?

कल बंगलौर के कई इलाकों में कुछ ऐसा ही हुआ था जब सद्दाम हुसैन को फ़ाँसी दिये जाने के विरोध हुयी हिंसक वारदातों में कई लोग घायल हुये, वाहन क्षतिग्रस्त हुये और स्थिति तनावपूर्ण हो गयी. चाकू-छुरी लेकर विरोध करने वालों में अधिकांश किशोर थे. मुझे यह आपत्ति नहीं कि रोष क्यों व्यक्त किया गया, बल्कि इस बात का दु:ख है कि किस तरीके से रोष व्यक्त किया गया. अजीब तरीका है यह, और हम भारतीय इसमें अच्छे-खासे माहिर हैं. जाने वो कैसे लोग हैं जिनको जलते हुये देश की आग में सिकी रोटियों में स्वाद आता है!

जनवरी 8, 2007

एक पेड़

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:00 पूर्वाह्न

एक खूबसूरत सा पेड़ जिसके दिन की शुरुआत किसी कोयल के मधुर गीत से नहीं होती, बल्कि यह तो हमेशा सहमा-सहमा रहता है. गाज़ा पट्टी के इलाके में खड़ा है यह!

पता नहीं कब बारूद के ढेर इसको राख कर दें! बस आसमान में बाँहें फैलाये दुआ ही माँग सकता है – अपने लिये, उन मासूमों के लिये जो स्कूल से लौटते वक्त इसकी छाँह में खेला करते थे कभी, और उनके लिये जिनसे इसकी कोई रंजिश तो नहीं पर फिर भी इसकी जान के दुश्मन बने हैं.

यह चित्र मैंने एट्रियम चित्र प्रदर्शनी (दिसम्बर २००६) में अपने कैमरे में उतारा था. चित्र लेने की अनुमति देने के लिये आयोजकों का धन्यवाद.

जनवरी 5, 2007

दो नैना एक कहानी

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 12:53 पूर्वाह्न

उत्तरी इटली का एक शहर ट्यूरिन. घूमते-घूमते एक चौक पर गया तो पाया कि खुले आकाश के नीचे खडी़ कई तस्वीरें मुझे अपने पास बुला रही हैं. अधिकांश तस्वीरें एशियाई और अफ़्रीकी देशों में ली गयीं थीं और उनमें चेहरे के कई भावों को उकेरने का प्रयास किया गया था. नीचे वाली तस्वीर है मुंबई में दो वक्त की रोटी की तलाश करती दो मासूम आँखों की.

do_naina.jpg

मुझे एक बात समझ नहीं आयी – यूरोपीय छायाचित्रकारों को कला की तलाश में गरीब देशों में क्यों आना पड़ा? क्या पेरिस की गलियों या न्यूयार्क की बहुमंजिला इमारतों में मानवीय चेहरों पर भावों का अभाव है? बिना पैसे दिये मॉडल, और वह भी स्वाभाविक, भला गरीब देशों में ही मिल सकते हैं (इसीलिये तो वे देश गरीब हैं!). अब है किसी की हिम्मत जो किसी यूरोपीय शहर में भीख माँगते किसी व्यक्ति की तस्वीर खींच सके बिना पैसे दिये!

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