पिटारा भानुमती का

फ़रवरी 16, 2007

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 3:31 पूर्वाह्न

मान लीजिये समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आपके ऊपर भरोसा करता है, आप प्रतिष्ठित हैं और आपकी विश्वसनीयता इतनी है कि लोग आपकी बात का सत्यापन करने का प्रयास तक नहीं करते. ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? क्या आप लोगों को लुभाने वाली मनगढ़ंत बातें और व्याख्याएं बताकर उनमें और भी लोकप्रिय होना चाहेंगे या अपने ऊपर एक जिम्मेदारी का आभास कर संयम से काम लेंगे?

चलिये अब आगे बढ़ने से पहले देखिये यह वीडियो जिसमें डॉ. ज़ाकिर नाइक ने बहुपत्नी प्रथा की वकालत करने का प्रयास किया है. मैं स्पष्ट कर दूँ कि इस लेख का उद्देश्य बहुपत्नी प्रथा की विवेचना करना नहीं, बल्कि इस संभावना की ओर इंगित करना है कि एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उसकी सुविधानुसार की गयी व्याख्याएं एक बड़े जन-समूह पर प्रभाव डालती हैं.

[YouTube = http://www.youtube.com/watch?v=7X65F9w0Neo%5D

इसमें कोई दो राय नहीं कि तर्क बड़े लुभावने हैं और अन्त में डॉक्टर साहब ने “पब्लिक प्रॉपर्टी” जैसे “सॉफ़िस्टिकेटेड” शब्द का इस्तेमाल कर जनता की वाहवाही भी खूब बटोरी है. पर क्या है इन तर्कों के पीछे का सच? आइये नज़र डालते हैं.

पहले तो ये कि ज़ाकिर साहब ने जो सांखिकीय आंकड़े दिये उनमें से अधिकांश ठीक नहीं हैं! उदाहरण के लिये जर्मनी में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से ५० लाख नहीं, १५ लाख अधिक है और यूनाइटेड किंगडम में यह अंतर ४० लाख नहीं, करीब साढ़े छह लाख ही है. खैर मुद्दे की बात यह नहीं है. मुख्य बात यह है कि इस प्रकार के तर्कों में आयु के अनुसार पुरुषों और स्त्रियों की संख्या, और साथ ही पुरुषों तथा स्त्रियों के अलग अलग औसत जीवन काल का बहुत महत्व है. अब जर्मनी ही लीजिये. यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से करीब १५ लाख अधिक है परन्तु ६५ वर्ष से अधिक आयु की स्त्रियों की संख्या ६५ वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों की संख्या के मुकाबले करीब २८ लाख अधिक है! कारण स्पष्ट है – महिलाओं का औसत जीवन काल अधिक होना. विश्व के लगभग सभी देशों में महिलायें पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक जीती हैं. इस प्रकार जर्मनी में १५ बर्ष से ६४ वर्ग के आयु समूह में महिलाओं की अपेक्षा १० लाख पुरुष अधिक हैं और डॉक्टर साहब जर्मनी में बहुपत्नीय समाज व्यवस्था की बात कह रहे हैं! अपने देश के संदर्भ में तो यह चर्चा करना और भी अर्थहीन हो जाता है. अजीब बात है कि इतनी सारी गणना करने में उन्होनें समलैंगिकों का तो ध्यान रखा पर इतनी महत्वपूर्ण बातें भूल गये.

किसी भी स्वस्थ जनसंख्या में ० से लेकर १४ वर्ष के आयु वर्ग में प्रति १०० लड़कियों पर औसतन १०५ लड़के होते हैं. उसके बाद यह अंतर और भी कम होता जाता है. आमतौर पर स्त्रियों का जीवन काल पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है, और कई बार यह अंतर इतना बड़ा होता है कि कुल आबादी में स्त्रियों की संख्या अधिक हो सकती है. जैसे कि रूस में महिलाओं का औसत जीवन काल है ७४ वर्ष और पुरुषों का मात्र ६१ बर्ष, और इस प्रकार ६५ वर्ष से अधिक आयु वर्ग में केवल ३१% पुरुष हैं – यानि इस आयु वर्ग में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या के दूने से भी अधिक!

यह तो रही सांखिकीय और आंकड़ों पर आधारित तर्कों की बात, पर जीवन में इससे भी अधिक गहरे और महत्वपूर्ण विषय हैं. उनकी व्याख्याएं प्रतिष्ठित व्यक्ति जिम्मेदारियों से साथ करते होंगे, ऐसी अपेक्षा है.

(इस लेख में सभी आंकड़े नवीनतम हैं और सी.आई.ए. से लिये गये है).

6 टिप्पणियाँ »

  1. सोचने वाली बात कही है.

    सभी अपनी सुविधा से सिद्धांत घड़ते है, क्या छोटा, क्या बड़ा.

    टिप्पणी द्वारा संजय बेंगाणी — फ़रवरी 16, 2007 @ 6:06 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अगर इस तरह की बाते करें तो उनके उत्तरदायित्व पर संदेह है लोगों को यह समझना होगा की हमारी महत्ता समाज में कैसी है और इसका प्रभाव क्या हो सकता है>>>वो स्पाइडर मैन की उक्ति बहुत सामयिक थी–With Great Power Comes Great Responsbility…Thnx.

    टिप्पणी द्वारा Divyabh — फ़रवरी 16, 2007 @ 12:01 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. मियां बात ऐसे कर रहे हैं जैसे किसी टीवी या सब्जी खरीदने की बात कर रहे हों, संख्या से ज्यादा जनाब अगर मुस्लिम औरतों के फ्रीडम की बात करते तो ज्यादा अच्छा होता।

    टिप्पणी द्वारा Tarun — फ़रवरी 17, 2007 @ 5:13 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  4. Amit ji paranam.

    Aaj tak aapne kabhi meri tippaniyon ki taraf shayad dhyaan nahin diya lekin fir bhi main ek dheeth puraane “note” ki tarah waapis a hi jaata hoon. Aajkal main apne desh main hoon. Kaafi peeda hoti hai is desh ka ye haal dekh kar. Sadak pe chalte hue kisi se nazarein mil jaye to woh patal ke boltaa hai “kya ghoor raha hai be”. Kamaal ki baat hai ki is desh main jahaan Nithari hatyakaand jaisi ghatnaoon ko “aam” bolke dabaya jaata hai, hum pareshaan ho rahe hain bahupatni pratha par. Aapke khyaalon se sehmat zaroor hoon main Amit ji parantu main sochta hoon ki humhaare saamne isse kahin badee chunautiyaan abhi aur hai.

    Sa-adar pranam
    Nikhil
    http://www.matrixconnects.com

    टिप्पणी द्वारा Nikhil — फ़रवरी 18, 2007 @ 9:37 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  5. मैं तो कहता हूँ .. ऐसे लोगों को जूते मार कर देश से निकाल देना चाहिये।

    टिप्पणी द्वारा विरोधी — मार्च 12, 2007 @ 7:52 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  6. अमितजी, जाकिर नायक के तर्क ऐसे ही अधकचरे होते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कई मुसलमान भाई इतने भोलेपन से उनपर कैसे यकीन कर लेते हैं। उनकी सब बातों का एक ही मतलब है- जो कुरान में लिख दिया गया, वह सब सही बाकी सब गलत। तर्क का प्रयोग संशय की स्थिति में सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए किया जाता है, पर यहां तो निष्कर्ष पहले निकलता है, बाद में तर्क गढे जाते हैं।

    टिप्पणी द्वारा विशाल — अप्रैल 25, 2007 @ 1:48 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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