पिटारा भानुमती का

जून 29, 2007

मुग़ल-ए-आज़म के संवाद

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:36 अपराह्न

हिन्दी सिनेमा में जब भी संवादों की बात निकलती है तब शोले फ़िल्म की याद आने लगती है. गब्बर सिंह का “कितने आदमी थे” से लेकर “बहूत याराना लगता है“, हर एक डायलॉग कोई भी सिनेमाप्रेमी आपको चुटकियों में सुना देगा.

साठ के दशक की शुरुआत में बनी के. आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म. इस फ़िल्म को “कार्य के प्रति समर्पण” का अनूठा उदाहरण माना जा सकता है. फ़िल्म तो पूरी बनकर १९६० में ही रिलीज़ हो सकी, परन्तु के. आसिफ़ ने १९४४ से ही इस फ़िल्म को बनाने की ठान ली थी, और उस समय उनकी उम्र थी मात्र २० वर्ष! मुग़ल-ए-आज़म के संवादों ने अपनी खूबसूरती के कारण मेरे ऊपर अमिट छाप छोड़ी है और आज उन्हीं की चर्चा. यह स्मृति के आधार पर है, अत: संवादों के कुछ शब्दों में हेर-फेर संभव है.

  • शहंशाह की बेहिसाब बख्शीशों के बदले ये कनीज़ जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को अपना खून माफ़ करती है.” – अनारकली (अकबर से)
  • जनाज़ा रुख़सत की इजाज़त चाहता है. – अनारकली (अकबर से); इससे मिलता जुलता भाव नई उमरावजान (२००६) के गीत “पूछ रहे हैं पूछने वाले” की आरंभिक पंक्तियों में मिलता है (“अब जनाज़े को तो रुख़सत की इजाज़त मिल जाये”)
  • खय्याम की शायरी अगर किसी पत्थर पर लिख दी जाये तो क्या उसके मायने बदल जायेंगे?” सलीम (दुर्जन से)
  • का़तिल ही नही, दिलदार भी है, शाख़-ए-गुल भी है, तलवार भी है.” – सलीम (दुर्जन से, अपनी तलवार के बारे में)
  • हम अपने बेटे के धड़कते हुए दिल के लिये हिन्दुस्तान की तकदीर नहीं बदल सकते.” – अकबर (जोधाबाई से?)
  • हम मोहब्बत के दुश्मन नहीं, अपने उसूलों के ग़ुलाम हैं.” – अकबर (जोधाबाई से?)
  • मोहब्बत करके देखिये, डर भाग जायेगा.” – सुरैया [अनारकली की बहन] (दुर्जन से)
  • कदम बोसी को राहें मुन्तज़िर हैं.” – बहार (अकबर से)

और अन्त में… पूरी फ़िल्म में मेरी सबसे प्रिय पंक्ति:

कांटों को मुरझाने का खौफ़ नहीं होता !” – अनारकली (सलीम से).

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जून 23, 2007

बूढ़े बाबा, सुनीता जी और भारत रत्न

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 4:22 अपराह्न

भारत भूमि पर रत्नों की कमी नहीं है. न जाने कितने अनमोल रत्न हर गाँव, हर गली में मिल जाते हैं अनायास ही, और हमारे-आपके बीच ही! वे कभी गाँव की कन्या पाठशाला की मास्टरनीजी के रूप में मिलते हैं, जिन्होंने न जाने कितने जीवनों को एक नई दिशा दी, कभी चिलचिलाती धूप में खेतों पर काम करते किसान के रूप में, तो कभी कड़ाके की सर्दी में सीमाओं की रक्षा करते हुए उस नवयुवक के रूप में जिसने अपना सारा जीवन देश के नाम लिख दिया है. धन्य है माँ भारती ऐसे रत्न पाकर! यदि भारत सरकार ऐसे सभी रत्नों को “भारत रत्न” से अलंकृत न कर सके तो भी वे भारतवासियों के हृदय में सदैव जड़े रहेंगे.

मुझे भी ऐसे रत्नों के दर्शन अक्सर होते रहे हैं, उनमें से एक हैं ये बूढ़े बाबा जिनको शायद आपने भी देखा होगा.

बरसों के अनुभव से पके हुये इस चेहरे पर भारतवासी होने का गर्व स्पष्ट झलकता है. ये बूढ़े बाबा उन सभी भारत रत्नों के प्रतिनिधि हैं जिनका मेरे हृदय में विशेष स्थान है और जिनके अनकहे, अनलिखे जीवन-दर्शन के कारण इस भूखण्ड की मिट्टी की गंध पहचानने लायक बन सका हूँ मैं!

आज एक चिट्ठे पर अंतरिक्ष का चक्कर लगाकर आने वाली सुनीता विलियम्स जी को “भारत रत्न” देने की हिमायत की गई. भारत सरकार किसे सम्मानित करे, किसे नहीं – यह मेरे लिये गौण प्रश्न है. जिस दिन देश की सभी आँखें इन बूढ़े बाबा जैसे अनेक रत्नों की परख कर पाने में सक्षम होंगी उस दिन किसे भारत रत्न मिलना चाहिये और किसे नहीं – ऐसे प्रश्न निरर्थक हो जायेंगे और देश एक नई राह पर चल पड़ेगा. उस दिन की प्रतीक्षा है मुझे!

(यदि आप ऊपर की तस्वीर वाले बाबा को ना पहचान पा रहे हों तो यहाँ जाकर उनसे परिचित हो लीजिये).

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