पिटारा भानुमती का

अक्टूबर 29, 2007

आइये पल्ला झाड़ें

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 6:25 अपराह्न

आज बी.बी.सी. की अंग्रेज़ी वेब-साइट पर देखा कि कपड़ों की एक नामी-गिरामी ब्राण्ड पर बाल मजदूरी करवाने का आरोप लगा है. वैसे सस्ते श्रम की उपलब्धता के कारण अच्छी से अच्छी कम्पनियों के कपड़े “मेड इन इण्डिया” या “मेड इन बंगलादेश” होते हैं, यह सर्वविदित है. कम्पनियाँ चाहती हैं कि सस्ती लागत में उनका काम चल जाये. वैसे इस सस्ती लागत का प्रभाव कीमतों पर ज़रा भी नहीं पड़ता! हमें कपड़े नहीं, उस पर छपे ठप्पे के नाम पर पैसे देने की आदत हो चली है, स्टेटस जो मैंटेन करना है!

मजेदार बात तो यह है कि उनके विज्ञापन का खर्चा भी हमारी जेब से जाता है. कम्पनी की आय का कितना हिस्सा श्रमिकों के हिस्से जाता होगा, पता नहीं. पर इस कम्पनी को कपड़े उपलब्ध कराने वाली एक फ़ैक्टरी लिये काम करने वाले १० साल के एक बच्चे को चार महीने से उसका वेतन नहीं मिला था! अब कहा जा सकता है कि इस मामले में कम्पनी को क्यों घसीटा जाये, उसका तो ऐसी घटना से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, गलती है तो फ़ैक्टरी की. कम्पनी तो खुद फ़ैक्टरी से माल खरीद रही है. हम भी परवाह क्यों करें, हमारी जिम्मेदारी तो ठप्पे की कीमत चुकाने के साथ ही खत्म हो जाती है. हम इस ठप्पे से आने वाले अपने सोशल स्टेटस के लिये १००० रुपये अधिक खर्च कर सकते हैं, पर घर की छत से दिखने वाली झुग्गी बस्ती में रहने वाले १० साल के रमेश की पढ़ाई के लिये २०० रुपये खर्च करने का विचार तक हमारे मन में नहीं आता. रमेश के माँ-बाप के पास भी पैसा नहीं है, इसीलिये वह पास की फ़ैक्टरी में शाम को कपड़ा काटने जाता है, धीरे-धीरे काम सीख जायेगा. पर जाने दीजिये, हमें क्या मतलब. हमारी ब्राण्डेड जींस का कपड़ा रमेश काटे या सुरेश, हमें क्या फ़र्क पड़ता है पर हम अपनी जेब फ़लाँ-फ़लाँ कम्पनी से ही कटवायेंगे यह स्टेटस वाली बात है.

बात पता नहीं कहाँ से कहाँ आ गई, पर मुझे यह समझ नहीं आया कि बाल-श्रम के लिये जिम्मेदार कौन हुआ? कम्पनी, फ़ैक्टरी या बच्चे के माँ-बाप? हम तो जिम्मेदार नहीं हैं, यह पक्की बात है!

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