पिटारा भानुमती का

मार्च 30, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – १)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 4:05 अपराह्न

कर्नाटक के दक्षिण पश्चिम में बसा कुर्ग अपनी प्राकृतिक सुन्दरता का अनूठा उदाहरण है। पश्चिमी घाट के पूर्व में बसा यह स्थान जितना खूबसूरत है उतने ही यहाँ के लोग। इस बार सोचा कि यहीं होकर आया जाये। मित्रों की टोली इकट्ठी हुयी और सब निकल पड़े बंगलौर से कुर्ग की हसीन वादियों की तरफ़। और सबसे अच्छी बात यह कि हमारे ठहरने की व्यवस्था किसी होटल में न होकर चारों ओर जंगल से घिरे चेंगप्पा परिवार के “हनी वैली ऐस्टेट्” में थी। कभी चेंगप्पा परिवार का व्यवसाय मधुमक्खी पालन हुआ करता था परंतु थाइलैण्ड से आये हुये एक वायरस के कारण उन्हें यह कार्य सीमित करना पडा। फिर उन्होंने निर्णय लिया कि वे हम जैसे सैलानियों का स्वागत अपने घर में करेंगे। अतिथि-गृह तैयार हुये उनके ही घर के पास और हम जैसे कंजूस लोगों को बहुत कम खर्चे में ऐसे मनोरम स्थल पर जाकर स्वयं को धन्य करने का मौका मिला।

२२ मार्च की सुबह हम कर्नाटक राज्य परिवहन की बस से विराजपेट पहुँचे। वहाँ से कब्बीनाकाड के लिये जीप पहले ही आरक्षित करा चुके थे सो निकल पड़े जीप में। जीप रुकी तो आस पास कुछ भी नज़र नहीं आया। “भैया, कहाँ छोड़ के जा रहे हो यार”? इतने में ही श्रीमान चेंगप्पा मुस्कुराते हुये हमारे सामने उपस्थित हुये। उन्होंने बताया कि अब वे स्वयं हमें पहाडी पर स्थित अपने “हनी वैली एस्टेट्” में लेकर जायेंगे। रास्ता दुर्गम था और बेहद सुन्दर। (वैसे भी लालची मनुष्य जहाँ जहाँ आसानी से पहुँच जाता है वह स्थान असुन्दर हो जाता है, सो दुर्गम रास्ते खूबसूरत होंगे ऐसी अपेक्षा की ही जा सकती है।)

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ऐसी खूबसूरती बटोरते हुये हम कुछ देर बाद अपने पड़ाव पर आ पहुँचे। क्या हम रहेंगे यहाँ! हुर्रे मुझे विश्वास हो चला कि अवश्य पिछले जन्म के सुकर्मों का फल होगा यह!

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सबने तैयार होकर श्रीमती चेंगप्पा और उनके सहयोगियों के हाथ का बना लज़ीज़ नाश्ता किया। फिर शरत् (चेंगप्पा परिवार का पुत्र,जो होटल प्रबंधन में परास्नातक भी है और सभी सैलानियों का खयाल रखता है) को पकड़ा और पूछा कि भाई बताओ अब क्या करें। शरत् ने तुरंत एक छोटी सी पुस्तक हमारे हाथ में थमा दी। उस पुस्तक में आस पास के इलाके का मानचित्र था। चलो, जंगल छान मारते हैं बहुत मज़ा आयेगा। सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि जल-प्रपात के एकदम नीचे जाते हैं। मानचित्र तो साथ है ही। बारिश हो रही थी तो लगा कि मज़ा दुगना हो जायेगा। कुछ ने हाथ में छतरी ली, कुछ ने बरसाती ओढी और सब निकल पडे पा पा पैंयां छप छप छैयां करते हुये… (क्रमश:)

मार्च 6, 2008

बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 6:25 अपराह्न

“बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र, क्या मानी”

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आज जब ये खबरें एक साथ देखीं तो साहिर की कविता ताज महल की ये पंक्तियाँ स्वत: याद आ गईं. जब मैं मुम्बई में रहता था तो अक्सर कफ़ परेड स्थित अम्बानी भाई के बंगले के सामने से गुजरना होता. सड़क के एक ओर रईस लोगो की तिजोरी और दूसरी तरफ़ मच्छिमार नगर में मछली पकड़कर पेट भरने वालों की झुग्गी बस्ती, कितना बड़ा विरोधाभास था सड़क भर के फासले पर. यही विरोधाभास दुनियाँ का बहुत बड़ा सच है!

विश्व में गरीबी से बड़ी समस्या है पैसे का वितरण! कुछ लोग चिकन बर्गर खाकर मोटे हो रहे हैं और दूसरी ओर लोग चूहे मारकर खाने को विवश हैं, अथवा स्वयं काल का ग्रास बन रहे हैं. पैसे के वितरण का आधार क्या है आख़िर? बुद्धि, शक्ति अथवा दूसरे का शोषण कर पाने की कला? या फिर केवल हाथ की लकीरें? क्या विश्व में ऐसी व्यवस्था कायम नहीं हो सकती जिसकी नींव मुहम्मद यूनुस साहब कुछ दशक पहले ही रख चुके हैं? जिनकी तिजोरियाँ भर चुकी हैं क्या उनका यह दायित्व नहीं कि वे पैसे की गिनती छोड़कर ऐसी व्यवस्था कायम करने आगे आयें?

वैसे वारेन बफेट साहब ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउन्डेशन में बहुत आर्थिक योगदान दिया है, आशा है उनका यह पैसा बी.बी.सी. समाचार में उनसे अंगुली भर के फासले पर बैठे जरुरतमन्द लोगों तक पहुँच सकेगा. वैसे मेरी समझ से बफेट साहब और यूनुस साहब के गरीबों के प्रति योगदान में मूल अंतर यह भी है कि यूनुस साहब का योगदान न सिर्फ आज गरीबों का पेट भरता है, बल्कि उन्हें कल के लिये सक्षम भी बनाता है, उन्हें यह सिखाता है कि वे “चैरिटी” के पात्र मात्र नहीं हैं.

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