पिटारा भानुमती का

मार्च 6, 2008

बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 6:25 अपराह्न

“बज्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र, क्या मानी”

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आज जब ये खबरें एक साथ देखीं तो साहिर की कविता ताज महल की ये पंक्तियाँ स्वत: याद आ गईं. जब मैं मुम्बई में रहता था तो अक्सर कफ़ परेड स्थित अम्बानी भाई के बंगले के सामने से गुजरना होता. सड़क के एक ओर रईस लोगो की तिजोरी और दूसरी तरफ़ मच्छिमार नगर में मछली पकड़कर पेट भरने वालों की झुग्गी बस्ती, कितना बड़ा विरोधाभास था सड़क भर के फासले पर. यही विरोधाभास दुनियाँ का बहुत बड़ा सच है!

विश्व में गरीबी से बड़ी समस्या है पैसे का वितरण! कुछ लोग चिकन बर्गर खाकर मोटे हो रहे हैं और दूसरी ओर लोग चूहे मारकर खाने को विवश हैं, अथवा स्वयं काल का ग्रास बन रहे हैं. पैसे के वितरण का आधार क्या है आख़िर? बुद्धि, शक्ति अथवा दूसरे का शोषण कर पाने की कला? या फिर केवल हाथ की लकीरें? क्या विश्व में ऐसी व्यवस्था कायम नहीं हो सकती जिसकी नींव मुहम्मद यूनुस साहब कुछ दशक पहले ही रख चुके हैं? जिनकी तिजोरियाँ भर चुकी हैं क्या उनका यह दायित्व नहीं कि वे पैसे की गिनती छोड़कर ऐसी व्यवस्था कायम करने आगे आयें?

वैसे वारेन बफेट साहब ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउन्डेशन में बहुत आर्थिक योगदान दिया है, आशा है उनका यह पैसा बी.बी.सी. समाचार में उनसे अंगुली भर के फासले पर बैठे जरुरतमन्द लोगों तक पहुँच सकेगा. वैसे मेरी समझ से बफेट साहब और यूनुस साहब के गरीबों के प्रति योगदान में मूल अंतर यह भी है कि यूनुस साहब का योगदान न सिर्फ आज गरीबों का पेट भरता है, बल्कि उन्हें कल के लिये सक्षम भी बनाता है, उन्हें यह सिखाता है कि वे “चैरिटी” के पात्र मात्र नहीं हैं.

3 टिप्पणियाँ »

  1. Mr. Yunus has had one of the greatest influence on international economic scenario. Thereafter numerous such proposals have come up in many nations. It is sad that the closest neighbor India chooses to ignore this. It is time that India starts looking at long time proposals for the betterment of the poor and take lessons from others success and failure.. nice post

    टिप्पणी द्वारा nishantchandgotia — मार्च 8, 2008 @ 11:38 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. One or two columns written in a very cool manner.. and all of a sudden.. the feeling comes.. as if Mark Twain’s soul has entered into one’s self.. then well start preaching… poor vs rich… chicken vs mouse.. and what not.. when some one does not do anything for anyone.. at-least keep quite.. don’t we have too many politicians already out there living the same old double-standard life..

    टिप्पणी द्वारा Prabhakar — अप्रैल 3, 2008 @ 11:00 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  3. मेरे चिट्ठे पर आकर अपने विचार व्यक्त करने का शुक्रिया प्रभाकर भाई. आपने विचार व्यक्त करने वाले की योग्यता पर प्रश्न उठाया है, उसके विचारों पर नहीं – यह जानकर संतोष हुआ. आप देश को आगे से खींचिये, पीछे से धक्का लगाने का काम हम जैसों का. गाड़ी ऐसे ही मिल-जुलकर आगे बढ़ेगी. किसी भी समस्या का समाधान उससे पलायन करने में नहीं, उसको समझकर उसका निराकरण करने में ही निहित है.

    यदि आप हिन्दी में अपनी टिप्पणी देते तो और भी अच्छा लगता.

    टिप्पणी द्वारा अमित — अप्रैल 4, 2008 @ 5:09 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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