पिटारा भानुमती का

अप्रैल 12, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – ३)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 9:39 अपराह्न

बारिश बहुत हो रही थी, मज़ा भी आ रहा था पर अभी बाहर निकलने की हिम्मत न थी। मैं अपने कमरे से ही नज़ारे देखता रहा।

कमरे से नज़ारा

अगले दिन की क्या योजना होगी? विचारविमर्श हुआ और निर्धारित किया गया कि एब्बी जलप्रपात और ब्यालाकुप्पे में स्थित बुद्ध विहार देखा जायेगा। शरत् ने हमारे लिये एक गाड़ी का प्रबंध भी करके रखा था। अगली सुबह नाश्ता करके निकला जायेगा, ऐसा विचार था। पर हममें से कुछ उत्साही लोग सुबह तड़के ही एक बार और आसपास का इलाका छान मार आये। वे ऐसी चोटी पर चढ़कर आये जहाँ से सब कुछ साफ़साफ़ देखा जा सकता था। वे लोग वापस आये और हम सब जीप में सवार हुये। समय था चेंगप्पा परिवार को विदा कहने का। हमने वादा किया कि अगली बार आपके यहाँ समय लेकर आयेंगे। हमारी गाड़ी अपने पहले गंतव्य स्थल एब्बी जलप्रपात की ओर रवाना हुई।

कुछ सामान गाड़ी के ऊपर रखा था, बारिश का डर भी था। सो हमने अपने ड्राइवर अली भाई से निवेदन किया कि वे प्लास्टिक की थैलियों की व्यवस्था करके हमारा ऊपर रखा सामान ढक दें। अली भाई का घर रास्ते में ही था। अपने बेटे को आवाज़ देकर वे अंदर खाने चले गये। उनका बेटा कुछ थैलियाँ लेकर निकला और हमारे सामान को ढक कर चला गया। कुछ समय बाद हम एब्बी प्रपात पहुँचे। हल्काफुल्का खाना खाया और प्रपात को निहारा। पानी बहुत अधिक नहीं था, पर वहाँ जाकर शान्ति महसूस हुई। थकान भी कम लग रही थी।

एब्बी जल-प्रपात

अब हम निकल पडे ब्यालाकुप्पे बुद्ध विहार की ओर। ब्यालाकुप्पे मैसूर के पश्चिम में स्थित कुशानगर नामक शहर के पास का इलाका है जिसमें १९६० के दशक में भारत आये करीब दस हज़ार तिब्बती लोग शरण ले रहे हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल हैं नामड्रोलिंग विहार और उससे लगा हुआ मंदिर। विहार और उसके आस-पास की सफ़ाई देखकर भ्रम हुआ कि कहीं हम भारत के बाहर तो नहीं आ गये!

बुद्ध मंदिर

इतना भव्य मंदिर तिब्बती लोगों की अपनी मातृभूमि से हज़ारों कोस दूर! भारत की यही रंगबिरंगी विविधता मुझे अक्सर अचंभित कर देती है। मंदिर के अंदर गया तो बच्चन जी की `बुद्ध और नाचघर’ का स्मरण हो आया। भला बुद्ध और मूर्ति! कहीं मैं एक विरोधाभास के बीच तो नहीं खड़ा?इसी बौद्धिक मंथन के बीच मेरी नज़र राजस्थान से आये एक परिवार पर पड़ी। चौखट को प्रणाम करके बुद्ध की मूर्ति के सामने इस परिवार के सदस्य उसी श्रद्धा से नतमस्तक होकर खड़े थे जैसे वे अपने किसी इष्ट देव का ध्यान कर रहे हों। जैसे भगवान हमारे, वैसे उनके“, यह भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट था। मूर्तियाँ एक अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करती हैं जिस रूप में सौंदर्य के दर्शन हों, उसी में मूर्ति ढाल लो और दे दो अपने देव का सांकेतिक स्वरूप। पहले बौद्धिक मंथन का समाधान हुआ तो मैं दूसरे में उलझ गया। “विश्व के सभी लोग उसी समरसता के साथ क्यों नहीं रह सकते जिसके दर्शन मुझे अभी इस राजस्थानी परिवार में हुये जैसे भगवान हमारे, वैसे उनके

बुद्ध मंदिर

मंदिर और उसके आस-पास घूमकर बहुत अच्छा लगा।

बुद्ध मंदिर

शाम के समय मुख्य मंदिर के सामने के दो कक्षों में जलते हुए दिये झरोखों से हमें देख रहे थे, मानो कुछ सीख दे रहे हों। वापस चलने का समय आया और हमने इन दियों से विदा ली।

अब वापस विराजपेट जाकर बंगलौर की बस पकड़ने का उद्देश्य था। रास्ते में चायपानी हुआ और बस के निर्धारित समय से करीब घण्टा भर पहले विराजपेट पहुँच गये। सुबह ४:३० बजे तक हम बंगलौर वापस थे। यात्रा यादगार रही। एक बार फिर जाने की इच्छा अभी भी है।

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अप्रैल 1, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – २)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:03 अपराह्न

बारिश का मज़ा लेते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थ। झाड़ियाँ-घने पेड़, सबको चीरते हुए हम सूखे तालाब के पास आ पहुँचे। यह जंगल के बीच में एक खुला स्थान था और कुछ ऊँचाई पर भी था, सो आस-पास का नज़ारा बखूबी निहारा जा सकता था। अब बारी थी मानचित्र खोलकर आगे का रास्ता समझने की। कुछ प्रबुद्ध साथियों ने इस क्लिष्ट कार्य में अपनी अकल लगाई।

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कुछ साथी इधर-उधर ताँक-झाँक कर रहे थे और मैं अपने कैमरे मैं सबको कैद कर रहा था।

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प्रबुद्ध साथियों को रास्ता समझने में सफलता प्राप्त हुई। आगे का रास्ता दुर्गम और संकरा था। सभी एक-दूसरे को पाँव संभालकर रखने की हिदायत दे रहे थे, खुद बेपरवाह चल रहे थे। बारिश की वजह से मिट्टी भी पोली हो चुकी थी। मुझे आभास हुआ जैसे कोई काँटा मेरे बांये पैर में चुभ रहा है। “यह सब तो होता ही रहता है, और भला वह शूरवीर ही क्या जो शूल चुभने पर ढेर हो जाये”, सो अभियान जारी रहा। “मुझे लगता है आधे से ज्यादा रास्ता तय हो गया है, पहुँचने ही वाले होंगे”, “अबे ध्यान से सुन, पानी की आवाज़ आ रही है, झरना पास ही है”, “बंगलौर वापस जाकर ’रेस’ देखेंगे” – ऐसे विचारपूर्ण संवादों को चीरती हुई एक ध्वनि सुनाई दी, “सब लोग रुक जाओ, सोमा को लीच (जौंक) ने काट लिया है!” मेरे होश गुम हो गए. जौंक काटने और सर्पदंश में अंतर करने की सुबुद्धि मुझ में थी ही नहीं। अब विचार आया कि मेरे बांये पैर में जो काँटा चुभ रहा है, कहीं वह भी जौंक तो नहीं! हिम्मत करके बांये पैर का अवलोकन किया, मेरा शक सही था! जौंक खून चूसकर मोटी हो रही थी, और मेरी हालत पतली! एक मित्र ने तुरंत मिट्टी से सना पत्थर उठाया और जौंक को परलोक पहुँचा दिया। शायद जौंक को शरीर से अलग करने का यह तरीका सही नहीं था, पर उस समय जो सूझा सो किया (शेर भी सामने आता तो उसे भी मिट्टी का ढेला उठाकर मारने का प्रयास किया जाता)। फिर देखा कि मेरे जूते के छेद में से होकर दो जौंक मेरे चरण-स्पर्श करने को उत्कंठित हैं। अब तक हिम्मत आ चुकी थी, और इन दोनों जौंकों ही हत्या का पाप मैंने अपने सिर लिया! बाकी साथियों की हालत भी ऐसी ही थी। हम जौंकों के (सुनियोजित?) आक्रमण का शिकार हो चुके थे! “अब क्या करें? वापस चला जाये क्या?” विचार-विमर्श होने लगा। मेरा कायर मन कह रहा था कि, चलो भाग चलो, पर होठों ने मन का साथ नहीं दिया और कमबख्त बोल उठे “कुछ दूर ही तो है, इतना आ गये हैं तो पूरा करके ही जाते है।” बाकी सब के होठों की भी यही राय थी। जल-प्रपात कुछ ५०० मीटर भर दूर था। जौंक चिपकती रहीं, शूरवीर बढ़ते रहे। जल-प्रपात के आधार तक हम पहुंचे, पर जौंकों के कारण सम्पूर्ण मनोयोग से आनन्द न ले सके। फिर भी बहुत अच्छा लग रहा था। अब बारी थी वापसी की। रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था। किसी तरह सूखे तालाब तक वापस आये। यहां जौंक नहीं थीं। सबने एक दूसरे की जौंक छुड़ायीं। रक्तरंजित पाँव हमारी वीरता की कहानी कह रहे थे। सहसा किसी के मुख से निकला एक समीकरण – “लीच + कीचड़ = लीचड़”; हमारे सुमुख से तत्काल उद्धृत हुआ “व्हाट ए बैड जौंक!”

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भोजन के समय से कुछ पहले हम वापस “हनी वैली एस्टेट्” आ गये। तैयार होकर भोजन करने गये और शरत् को अपना यात्रा वृतांत सुनाया। शरत् ने बताया कि जंगल के इस भाग को “लीच पैलेस” कहते हैं। हमें आभास हुआ कि अभियान पर निकलने से पहले हमें शरत् से सविस्तार विचार-विमर्श करना चाहिये था। भोजन बहुत अनूठा था; इसकी विशेषता थी कि अगर कोई विदेशी इस भोजन को खाये तो उसे बहुत मसालेदार न लगे और कोई देसी खाये तो उसे फीका न लगे। भोजन के उपरान्त कुछ ने आराम किया और कुछ निकल गये आस-पास के क्षेत्र में तस्वीरें खींचने। (क्रमश:)

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