पिटारा भानुमती का

अप्रैल 1, 2008

मेरी कुर्ग यात्रा (भाग – २)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 10:03 अपराह्न

बारिश का मज़ा लेते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थ। झाड़ियाँ-घने पेड़, सबको चीरते हुए हम सूखे तालाब के पास आ पहुँचे। यह जंगल के बीच में एक खुला स्थान था और कुछ ऊँचाई पर भी था, सो आस-पास का नज़ारा बखूबी निहारा जा सकता था। अब बारी थी मानचित्र खोलकर आगे का रास्ता समझने की। कुछ प्रबुद्ध साथियों ने इस क्लिष्ट कार्य में अपनी अकल लगाई।

dsc04125.jpg

कुछ साथी इधर-उधर ताँक-झाँक कर रहे थे और मैं अपने कैमरे मैं सबको कैद कर रहा था।

dsc04127.jpg

प्रबुद्ध साथियों को रास्ता समझने में सफलता प्राप्त हुई। आगे का रास्ता दुर्गम और संकरा था। सभी एक-दूसरे को पाँव संभालकर रखने की हिदायत दे रहे थे, खुद बेपरवाह चल रहे थे। बारिश की वजह से मिट्टी भी पोली हो चुकी थी। मुझे आभास हुआ जैसे कोई काँटा मेरे बांये पैर में चुभ रहा है। “यह सब तो होता ही रहता है, और भला वह शूरवीर ही क्या जो शूल चुभने पर ढेर हो जाये”, सो अभियान जारी रहा। “मुझे लगता है आधे से ज्यादा रास्ता तय हो गया है, पहुँचने ही वाले होंगे”, “अबे ध्यान से सुन, पानी की आवाज़ आ रही है, झरना पास ही है”, “बंगलौर वापस जाकर ’रेस’ देखेंगे” – ऐसे विचारपूर्ण संवादों को चीरती हुई एक ध्वनि सुनाई दी, “सब लोग रुक जाओ, सोमा को लीच (जौंक) ने काट लिया है!” मेरे होश गुम हो गए. जौंक काटने और सर्पदंश में अंतर करने की सुबुद्धि मुझ में थी ही नहीं। अब विचार आया कि मेरे बांये पैर में जो काँटा चुभ रहा है, कहीं वह भी जौंक तो नहीं! हिम्मत करके बांये पैर का अवलोकन किया, मेरा शक सही था! जौंक खून चूसकर मोटी हो रही थी, और मेरी हालत पतली! एक मित्र ने तुरंत मिट्टी से सना पत्थर उठाया और जौंक को परलोक पहुँचा दिया। शायद जौंक को शरीर से अलग करने का यह तरीका सही नहीं था, पर उस समय जो सूझा सो किया (शेर भी सामने आता तो उसे भी मिट्टी का ढेला उठाकर मारने का प्रयास किया जाता)। फिर देखा कि मेरे जूते के छेद में से होकर दो जौंक मेरे चरण-स्पर्श करने को उत्कंठित हैं। अब तक हिम्मत आ चुकी थी, और इन दोनों जौंकों ही हत्या का पाप मैंने अपने सिर लिया! बाकी साथियों की हालत भी ऐसी ही थी। हम जौंकों के (सुनियोजित?) आक्रमण का शिकार हो चुके थे! “अब क्या करें? वापस चला जाये क्या?” विचार-विमर्श होने लगा। मेरा कायर मन कह रहा था कि, चलो भाग चलो, पर होठों ने मन का साथ नहीं दिया और कमबख्त बोल उठे “कुछ दूर ही तो है, इतना आ गये हैं तो पूरा करके ही जाते है।” बाकी सब के होठों की भी यही राय थी। जल-प्रपात कुछ ५०० मीटर भर दूर था। जौंक चिपकती रहीं, शूरवीर बढ़ते रहे। जल-प्रपात के आधार तक हम पहुंचे, पर जौंकों के कारण सम्पूर्ण मनोयोग से आनन्द न ले सके। फिर भी बहुत अच्छा लग रहा था। अब बारी थी वापसी की। रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था। किसी तरह सूखे तालाब तक वापस आये। यहां जौंक नहीं थीं। सबने एक दूसरे की जौंक छुड़ायीं। रक्तरंजित पाँव हमारी वीरता की कहानी कह रहे थे। सहसा किसी के मुख से निकला एक समीकरण – “लीच + कीचड़ = लीचड़”; हमारे सुमुख से तत्काल उद्धृत हुआ “व्हाट ए बैड जौंक!”

dsc04142.jpg

भोजन के समय से कुछ पहले हम वापस “हनी वैली एस्टेट्” आ गये। तैयार होकर भोजन करने गये और शरत् को अपना यात्रा वृतांत सुनाया। शरत् ने बताया कि जंगल के इस भाग को “लीच पैलेस” कहते हैं। हमें आभास हुआ कि अभियान पर निकलने से पहले हमें शरत् से सविस्तार विचार-विमर्श करना चाहिये था। भोजन बहुत अनूठा था; इसकी विशेषता थी कि अगर कोई विदेशी इस भोजन को खाये तो उसे बहुत मसालेदार न लगे और कोई देसी खाये तो उसे फीका न लगे। भोजन के उपरान्त कुछ ने आराम किया और कुछ निकल गये आस-पास के क्षेत्र में तस्वीरें खींचने। (क्रमश:)

3 टिप्पणियाँ »

  1. badhiya..
    agar kabhi kurg jaane ka plan bana to aapse hi milenge..🙂

    टिप्पणी द्वारा Prashant Priyadarshi — अप्रैल 2, 2008 @ 6:01 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. कुर्ग यात्रा के बारे में पढ कर मजा आ गया। लगा जैसे खुद ही घूम रहें हों। मेरा भी ब्लाग है घूमक्कडी को समर्पित देखियेगा।

    टिप्पणी द्वारा dipanshu — अप्रैल 2, 2008 @ 6:19 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. wonderful

    टिप्पणी द्वारा kd sharma — अप्रैल 10, 2010 @ 10:39 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: