पिटारा भानुमती का

जुलाई 14, 2008

रेल की खिड़की से (चित्र – १)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 8:57 अपराह्न

सुबह का समय; दिल्ली से चंडीगढ़ तक की छोटी सी रेल यात्रा – कुछ घण्टे भर की दूरी। मुझे खिड़की वाली जगह पसंद है, वहीं बैठा हूँ। बाहर झाँकता हूँ तो झाँकने का मन, सच कहें कि साहस नहीं होता क्योंकि पटरी के पास झुग्गियों में बसे लोगों की मजबूरी अन्दर झाँकने लगती है। लालकिले से ब्रितानी झण्डा उतरे ६० साल हो चुके हैं, विश्वास नहीं होता! समझ नहीं आता दोष किसके मत्थे मढ़ूँ – व्यवस्था के, इन लोगों की किस्मत के, लालची जन प्रतिनिधियों के, खुद इनके या अपने? एकाएक मन में विचार उठते हैं कुछ करने के! शायद शिक्षा की ज्योति इनके अंधेरे दूर कर सके?

विचार लोक में विचरण करते-करते मैं रेल को हरे भरे खेतों के बीच में पाता हूँ। रेल हरियाणा से होकर गुज़र रही‌ है। पकने को आतुर गेंहूँ की बालें हाथ हिलाकर अभिवादन करती हैं, मेरा मन भी उन्हें झुककर प्रणाम करता है “शस्य श्यामला मातरम्”। राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियों का स्मरण हो उठता है-

“तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं?
मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं?
किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं?”

साठ के दशक में आई हरित क्रांति के फलस्वरूप हरियाणा और पंजाब का लहलहाता हुआ यह इलाका आम जीवन में शिक्षा और तकनीकी के महत्व की कहानी स्वयं कह रहा है। मुझे याद आती है भारतीय उपग्रहों के फसल बीमा में उपयोग की अनूठी तकनीक की; मुझे भारतीय होने पर गर्व होने लगता है। सहसा मेरी नज़र पटरियों पर पड़े चिप्स के खाली पैकैटों, प्लास्टिक की थैलियों और सिगरेट के बक्से पर जाती है और मैं बाहर झाँकना बंद कर देता हूँ!

क्या मेरे आँखें फेर लेने से सच्चाई बदल जायेगी?

2 टिप्पणियाँ »

  1. Sabhi aankh band kiyen hain…Ek sajag jagrukta ki jaroorat hai is disha me varna jab bhi aankh khulegi aur bhishan swaroop dekhne ko milega.

    टिप्पणी द्वारा Sameer Lal — जुलाई 14, 2008 @ 9:53 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. हम हरियाली रचते हैं, कचरा आयात करते हैं।

    टिप्पणी द्वारा दिनेशराय द्विवेदी — जुलाई 15, 2008 @ 2:50 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया


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