पिटारा भानुमती का

जुलाई 17, 2008

रेल की खिड़की से (चित्र – २)

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 7:13 अपराह्न

सुबह का समय; और इस बार यात्रा दिल्ली और आगरा के बीच। ताज एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी कुर्सी यान में खिड़की वाली कुर्सी पर बैठा हूँ मैं। संदेह होता है कहीं अनारक्षित डिब्बा तो नहीं है ये! मुझे मुंबई लोकल के अनुभवों की याद आ रही‌ है। एक युवा जोड़े का आगमन होता है, उनकी आरक्षित कुर्सी घेरी जा चुकी है; इस देश में कुर्सी की ताकत बहुत है! पत्नी जी कुर्सीखोरों से कुर्सी को मुक्त कराने का प्रयास करती हैं। “तो हम कहाँ बैठें बहनजी”? इतने विचारपूर्ण तर्क से पत्नी जी तिलमिला जाती हैं और गाँधीवादी शैली में कहतीं हैं, यहीं बैठो! कुर्सीखोर खटमल की तरह अब भी कुर्सी से चिपके हुये हैं!

गाड़ी अब तुगलकाबाद के पास के नाले और कचरे के ढेर को पार कर रही है। आई.आई.एम. वालों को कचरा मैनेजमेंट में भी एक कोर्स रखना चाहिये! कचरे से ईंधन बन जाता है, बहुत सुन रखा है। अगर हमारी सरकार को भी सुनाई दे जाता तो न्यूक्लियर डील की नौबत न आती और सरकार को ये दिन नहीं देखना पड़ता। गाड़ी कचरों के ऐसे कई ढेरों को पार करती चली आ रही‌ है और मैं निठल्ला चिंतन में व्यस्त हूँ। कचरों के इस धुंध में एक किरण आती है और फ़रीदाबाद का पी.वी.आर. सिनेमा दिखाई देता है। कचरे और पी.वी.आर. में बस आँखों के लेंस की फ़ोकल लेंथ को एडजस्ट करने भर की दूरी है! “यूनिटी इन डायवर्सिटी” का इससे अच्छा उदाहरण कहाँ मिलेगा।

तभी टिकट चेकर साहब का आगमन होता है। मेरे हृदय में बेटिकट और अनारक्षित यात्रियों के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है, “चलो अच्छा है, भीड़ कम होगी”। अगले ही क्षण मुझ में स्वयं के प्रति दया भाव उत्पन्न होता है क्योंकि टी.सी. साहब बहुत दयालु हैं और सबका काम पक्का करते जा रहे हैं! भला हो इस देश का।

अब नाश्ते का समय हो चला है और पेट में चूहे दौड़ने लगे हैं। मैं एक बिस्किट, चिप्स और ‘ठंडा बिसलरी’ खरीद लेता हूँ। तभी अगली कुर्सी वाले सज्जन बीड़ी सुलगा लेते हैं, मेरे प्रतिरोध करने पर बंद तो कर देते हैं, पर अपनी आँखों से मुझे जता देते हैं कि मेरे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया जा रहा है।

अब मेरे चिप्स खत्म हो चुके हैं। चिप्स का पैकेट कितना ही बड़ा क्यों न हो, हमेशा छोटा ही लगता है। हिन्दी में वो कहावत है न, “नो वन कैन ईट जस्ट वन्स”! पैकेट खाली है और अपनी नियति जानता है, पटरी मिलाप! पर मैं एक सभ्य नागरिक हूँ, ऐसा नहीं होने दूँगा, किसी कूड़ेदान में ही डालूँगा। यही सोचकर उसे अपने बस्ते की आगे वाली जेब में रख लेता हूँ।

अब आगरा का राजा की मण्डी स्टेशन आ चुका है, मैं एक कूड़ेदान की तलाश में हूँ, मेरी कोशिश असफल रहती है!

दो दिन बाद मैं वापस दिल्ली जाने के लिये प्लेटफ़ार्म पर खड़ा गाड़ी की‌ प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सहसा बस्ते की आगे वाली जेब में हाथ जाता है। चिप्स के पैकेट का स्पर्श होते ही मैं कूड़ेदान की खोज में पूरा प्लेटफ़ार्म खोज मारता हूँ। एक बार फिर मेरी कोशिश असफल रहती है!

“अगर मुझे पटरी पर ही फेंक दिया होता तो कम से कम खुली हवा में साँस तो ले रहा होता, ये बस्ते में तो नहीं सड़ना पड़ता”! मैं चिप्स के पैकेट के समक्ष लज्जित हो जाता हूँ!

8 टिप्पणियाँ »

  1. जब कुडे दान मिल जाये तो हमे भी बताना,कभी आगरा जान पडा तो समय बच जाये गा

    टिप्पणी द्वारा राज भाटिया — जुलाई 17, 2008 @ 8:51 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. यात्रा में आपको हर बार खिडकी नसीब हो. हम देख सकें जो आपको दिखायी दे. अच्छा है. बधाई.

    टिप्पणी द्वारा विजय गौड — जुलाई 17, 2008 @ 9:17 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. झाँकते रहिये खिडकी से और जारी रखिये किस्सागोही. सही जा रहे हैं.

    टिप्पणी द्वारा Sameer Lal — जुलाई 17, 2008 @ 9:44 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  4. बढ़िया लिखा है। एक बार हमने भी दिल्ली से आगरा की यात्रा की थी। उसमें एक मनचलों के झुण्ड ने पूछा था यह आरक्षण भारत में कबसे होने लगा और आरक्षित टिकट वाले खड़े थे।
    आपके चिप्स के पैकेट की तरह मैंने भी बहुत बार फलों के छिलके तक को पूरी यात्रा करवाकर घर के कूड़ेदान के हवाले किया है।
    घुघूती बासूती

    टिप्पणी द्वारा ghughutibasuti — जुलाई 19, 2008 @ 5:45 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  5. amit bhaisab,
    aapka chittha dekh kar atyant prasannta hui.
    ham kabhi kabhi aapke vande mataram par chakkar lagate the… lekin kaafi
    samay se waha par kuch naya nahi likha gaya.
    aaj baithe aise hi aapka khayal man mai aaya to aapka naam google mahoday ki
    sahayata se khoja aur aapke chitthe ke darshan ho gaye.

    wakai bahut achcha aur dil ko choo lene wala likhte ho aap.
    bhagwan aapki harek manokamna poorna kare aur aap
    jagat-prasiddh ho.

    aapka shubhechu
    amit agarwal (agra wala)

    टिप्पणी द्वारा Amit Agarwal — सितम्बर 5, 2008 @ 1:49 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  6. 🙂

    टिप्पणी द्वारा Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) — अगस्त 2, 2010 @ 1:39 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  7. हा हा हा
    रोचक यात्रा संस्मरण🙂

    टिप्पणी द्वारा राजीव नन्दन द्विवेदी — अगस्त 2, 2010 @ 6:23 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  8. तुगलकाबाद से राजा की मण्डी बडी जल्दी पहुंचे।

    टिप्पणी द्वारा नीरज जाट जी — अगस्त 5, 2010 @ 7:31 अपराह्न | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: