पिटारा भानुमती का

अगस्त 27, 2011

शॉर्ट-कट उर्फ़ भ्रष्टाचार

Filed under: अश्रेणीबद्ध — अमित @ 7:30 अपराह्न

ट्रैफ़िक नियम तोड़ते हुए पकड़े जाओ तो १०० का नोट थमाओ, किसे पड़ी है ट्रैफ़िक पुलिस ऑफ़िस जाकर ३०० रुपये भरने की? तू भी खुश, मैं भी खुश। ट्रेन में बिना टिकट और बिना किच-किच यात्रा करनी हो तो टी.टी. को ‘पटाओ’। तू भी खुश, मैं भी खुश। मुन्ने के बर्थ-डे पर घर के बाहर तम्बू लगाकर बिजली चोरी करते हुए न पकड़े जाने के लिये बिजली विभाग के सुपरवाइज़र को ‘प्रसाद’ चढ़ाओ। इस बार भी तू भी खुश, मैं भी खुश। बिजली कौन से सुपरवाइज़र के घर की है! क्या यह देश हमारा, हम सबका घर नहीं है?

हमें आदत हो चुकी है शॉर्ट-कट की। इस शॉर्ट-कट में‌ हमें कोई भ्रष्टाचार भी नज़र नहीं आता। भ्रष्टाचार तो तब होता है जब हमारी जेब ‘अफोर्ड’ नहीं कर पाती! तब लगता है, काश, कोई अन्ना हज़ारे सशक्त कानून बनवा गया होता तो भ्रष्टाचारियों को अंदर करा देते।

पर भ्रष्टाचार के पेड़ को रोज़ाना ५०-१०० रुपये के नोट से किसने सींचा? हमारी शॉर्ट-कट की आदत ने हमारे अच्छे-भले की समझ को ही कट-शॉर्ट कर दिया। क्या ये दोष भी हम सरकार के मत्थे मढ़ दें? नेता, अफ़सर, नौकरशाह, सब हमें भ्रष्टाचार से सराबोर नज़र आते हैं पर अपने गरेबाँ में झाँकने का साहस हमारे में नहीं। यदि हर हिन्दुस्तानी यह साहस दिखा सके तो भ्रष्टाचार के मुँह पर इससे अधिक करारा तमाचा और कोई नहीं हो सकता, कोई कानून भी नहीं। “मैं रिश्वत नहीं दूँगा, भले ही कुछ दिन और परेशानी झेलनी पड़े”। क्या यह संकल्प सचमुच इतना कठिन है? यदि हाँ, तो मैं कहूँगा कि अन्ना जी बेवजह ही परेशान हो रहे हैं असंवेदनशील, निराशावादी लोगों की उस भीड़ के प्रति जो भ्रष्ट तंत्र को अपनी नियति मान चुकी है।

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